9 नवंबर 2019 : आखिर कैसे एक यादगार दिन बन गया


इस साल 9 नवंबर का दिन भारत के पत्रकारों और खासतौर से संपादकों के लिए काफी आतंकित करने वाला दिन रहा। उस दिन उन्हें एक बार फिर से पत्रकारिता पेशे की कई अहम चुनौतियों से रुबरु होना पड़ा। इसमें कोई दो राय नहीं है कि यह चुनौतियां वास्तव में बहुत परेशान करने वाली थी। 

हाल के दिनों में इतनी सारी घटनाएं एक साथ घटित हुईं जो कि राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण जगह रखती थी। यह नए मीडियाकर्मियों के लिए सीखने व अनुभव करने का एक अच्छा मौका था। 

पत्रकारों की नियति भी अजीब होती है। कभी-कभी उन्हें समाचारों की खोज में भटकना पड़ता है और कभी-कभी घटनाक्रम इतनी तेजी से वदलता है कि समझ में नहीं आता कि कौन सा समाचार लिया जाय औकर किसको छोड़ा जाय। यह फैसला करना वरिष्ठ संपादकों के लिए भी कठिन हो जाता है। कि पाठक की रुचि किस समाचार में अधिक होगी। 

फिर यह भी समस्या होती है कि किस समाचार को प्राय़मिकता दी जाय। यदि प्रसारण मीडिया की बात की जाय तो किस समाचार को पहले दिखाया या सुनाया जाय और अगर मुद्रण मीडया की  बात की जाय तो किस समाचार को किस पृष्ठ पर कितने बड़े टाइप की हेडलाइन के साथ छापा जाय। 

इसी समस्या ने 9 नवंबर को अच्छे-अच्छे पत्रकारों का पसीना निकाल दिया। एक दिन में चार एक से एक बड़ी समाचार प्रधान घटनाएं हुईं और यह तय करना मुश्किल हो गया कि टीवी के दर्शक और समाचार पत्रों के पाठकों की रुचि किस समाचार में सबसे अधिक होगी। 

वैसे तो यह सबको पता था कि मुख्य न्यायाधीश गोगोई नवंबर में सेवानिवृत्त होने से पहले फैसला करने के इच्छुक हैं पर नवंबर 8 की देर शाम तक यह बात कहीं नहीं थी कि अगली सुबह सुप्रीम कोर्ट बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि केस पर अपना फैसला सुना देगा। तब तक मुख्य खबर अगली सुबह करतारपुर कोरिडोर का खोला जाना था जो अपने आप में एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात थी। 

एक तो वैसे ही यह दो राष्ट्रों के बीच होने वाले समझौते के कारण अंतर्राष्ट्रीय स्तर का समाचार था। फिर भारत-पाकिस्तान के इस वर्ष के प्रारम्भ में होने वाले सशस्त्र टकराव और धारा 370 के हटाए जाने के बाद पाकिस्तान के विरोध ने करतारपुर कोरिडोर के उद्घाटन को और भी महत्वपूर्ण बना दिया था। मानी बात थी कि इसका समाचार मूल्य बहुत अधिक था। 

नवंबर 9 को वर्ष 1989 में पूर्व और पश्चिमी जर्मनी के बीच बर्लिन दीवार के टूटने ने करतारपुर कोरिडोर को और भी संकेतात्मक महत्व दिया था।

इस सब से अलग हटकर तमाम लोगों का ध्यान महाराष्ट्र के राजनैतिक गतिरोध पर था। जहां भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और शिव सेना गठबंधन में टूट के लक्षण साफ दिखाई दे रहे थे। विधानसभा का समय समाप्त होने तक नई सरकार न बन पाने के कारण राष्ट्रपति शासन की संभावना स्पष्ट दिखाई दे रही थी जो वास्तव में जनादेश की अवहेलना थी। 

किसी को भी यह अंदाजा नहीं था कि चुनाव जीतने के बाद भाजपा-शिव सेना का यह पारम्परिक गठबंधन टूट भी सकता है। प्रश्न यह भी था कि इस गठबंधन का कई विकल्प नहीं है और विधानसभा भंग करके पुनः चुनाव कराने का विकल्प कोई भी स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होगा इसलिए राज्य में देर-सबेर भाजपा-शिव सेना की ही सरकार बनेगी। 

करतारपुर कोरिडोर के संदर्भ में  भारत-पाकिस्तान संबंध तथा महाराष्ट्र के राजनैतिक गतिरोध के चलते पूर्वी भारत और बांग्लादेश की मानवीय त्रासदी की ओर लोगों का ध्यान गया ही नहीं। पर अनुभवी और संवेदनशील पत्रकार जानते थे कि बंगाल की खाड़ी में उठने वाला समुद्री तूफान बुलबुल जन-धन का व्यापक नुकसान करने की क्षमता रखता है और बारत तथा बांग्लादेश दोनों देश  व्यापक प्राकृतिक आपदा का शिकार हो सकते हैं। यह वास्तव में बहुत बड़ा समाचार था। जो बहुत बड़ी मानवीय त्रासदी को इंगित कर रहा था और जिसका महत्व करतारपुर कोरिडोर और महाराष्ट्र के राजनैतिक गतिरोध से कहीं अदिक था।

इन बड़े समाचार के बीच में घिरे पत्रकार कुछ निर्णय ही नहीं कर पा रहे थे कि क्या किया जाय जिससे किसी भी समाचार के साथ अन्याय न हो। पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बात ने माहौल बिल्कुल बदल दिया। एक हजार पृष्ठों से अधिक फैसले की फाइल में उलझकर पत्रकार अन्य सब बाते भूल गए।  इस तरह समाचार माध्यमों पर छापी कुछ महत्वपूर्ण घटनाएं यकायक महत्वहीन हो गई। #

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