सत्ता के गलियारों से : दिल्ली दंगा : दंगा पीड़ित जनता के कटघरे में खड़े केजरीवाल

 


न आंदोलन की राजनीति से उभरे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपने छोटे से राजनैतिक जीवन में वैसे तो कई कीर्तिमान स्थापित किए हैं लेकिन अब की बार उन्होंने एक खास कीर्तिमान स्थापित किया है। हाल में हुए दिल्ली चुनाव में मिले व्यापक जनसमर्थन के बदौलत बहुत बड़ी सफलता का स्वाद चखने वाले केजरीवाल महज 15 दिन के भीतर ही अपने तमाम समर्थकों व जनता का विश्वास खोते जा रहे हैं और जनता के कटघरे में खड़े होने वाले वह देश के पहले नेता बन गए हैं। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में यह कोई नई बात नहीं है कि जिस व्यक्ति को बड़ी आशा और उत्साह के साथ जनता ने चुना हो, उसने फिर बाद में मतदाताओं को निराश किया हो। लेकिन मतदाताओं की आशा और निराशा के बीच की इस दूरी की यात्रा को इतने कम समय में तय करने वाले अकेले नेता केजरीवाल ही हैं। शायद उनका यह रिकार्ड अभूतपूर्व माना जाएगा।

सत्तर संसदीय दिल्ली विधानसभा चुनाव में लगभग 90 प्रतिशत सीटों की अप्रत्याशित विजय और तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने के महज 15 दिन के भीतर ही जनता के कटघरे पर खड़े होकर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपनी छवि के उपर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह लगा लिया है। दिल्ली में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की यात्रा के दौरान हुई व्यापक साम्प्रदायिक हिंसा के संदर्भ में उनकी भूमिका पर उनके राजनैतिक मित्र और शत्रु, मीडिया तथा बुद्धिजीवी वर्ग सभी हैरान हैं। आम आदमी भी यह कह रहा है कि बड़े जोर-शोर से अपने को दिल्लीवासियों का बेटा बताने वाले तथा उनके दरवाजे सबके लिए खुले हैं कहने वाले केजरीवाल तब कहां छपे हुए थे जब दिल्ली जल रही थी।

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की यह बात भी लोगों के गले नही उतरती रही है कि दिल्ली पुलिस उनके नियंत्रण में नहीं है इसलिए वह कुछ नहीं कर पाए। वर्ष 2005 में चुनाव के पूर्व जब उहोंने तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित पर दिल्ली की बिगड़ती हुई कानून व्यवस्था को लेकर आरोप लगाया था तब एक पत्रकार ने उनसे कहा था कि शीला दाक्षित जी क्या करती पुलिस तो उनके अधिकार क्षेत्र आती ही नहीं। इस पर केजरीवाल का जवाब था कि मुख्यमंत्री यदि चाहे तो बहुत कुछ कर सकता है। अब यह पुराना वीडियो वायरल हो रहा है और लोग केजरीवाल से पूंछ रहे हैं कि अब जब वह स्वयं मुख्यमंत्री के पद पर आसीन हैं तो उन्होंने क्यों कुछ नहीं किया। राष्ट्रपति ट्रंप के विदा होने के अगले दिन जब केंद्र की सरकार ने दंगों को रोकने के लिए शूट-एंड-साइट के आदेश जारी किया और सशस्त्र बलों को तैनात किया तब मुख्यमंत्री केजरीवाल ने एक बयान जारी करते हुए सेना को तैनात करने की बात कही, जो कि यह बात समझ से परे है।

दिल्ली की साम्प्रदायिक हिंसा को रोकने में असफल रहे पुलिस आयुक्त अमूल्य पटनायक की भूमिका पर भी प्रश्नचिन्ह लग रहे हैं। स्थित को संभालने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को स्वयं मैदान में उतरना पड़ा। अजीत डोभाल  ने पुलिस अधिकारियों से अपनी मीटिंग में उन्होंने पुलिस आयुक्त के आने पर रोक लगाई। फिर दो दिन बाद पुलिस आयुक्त पटनायक को अपने पद से हटा दिया गया। इन सबके दौरान आश्चर्य की बात यह रही कि मुख्यमंत्री केजरीवाल ने इस घटनाक्रम में पुलिस आयुक्त की भूमिका के बारे में एक शब्द भी नहीं बोला। जब 26 फरवरी को स्थित नियंत्रण में आयी तब जाकर केजरीवाल अपने उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के साथ दंगाग्रस्त इलाकों का दौरा करने के लिए निकले। 

दिल्ली की हर छोटी–बड़ी बात पर बड़े जोर-शोर से बोलने वाले केजरीवाल, मौजूदा हुई सांप्रदायिक हिंसा और आगजनी पर इस तरह की प्रतिक्रिया और राजनैतिक व्यवहार अधिकांश लोगों की समझ से परे है। गृहमंत्री अमित शाह के साथ हुई अपनी मीटिंग के बारे में भी केजरीवाल ने कुछ नहीं कहा। पर उस मीटिंग के बाद केजरीवाल और अमित शाह द्वारा दिए गए बयान परस्पर विरधी थे जो कि यह भी समझ से परे ही है। केजरीवाल ने अपने बयान में कहा कि दिल्ली की सुरक्षा के लिए पुलिस बल की कमी है। उसके थोड़े ही समय बाद केजरीवाल की बात को काटते हुए गृहमंत्री अपने बयान में कहते हैं कि पुलिस बल की कहीं कोई कमी नहीं है। इन परस्पर विरोधी बयानों के बाद उसी शाम फिर जमकर हिंसा हुई जिसमें काफी जान माल का नुकसान हुआ। चुनाव प्रचार के दौरान केजरीवाल और उनकी पार्टी के नेताओं ने तमाम उन परस्पर विरोधी विवादग्रस्त मुद्दों पर मौनसाधना का पालन किया जिन पर व्यापक राष्ट्रीय विमर्श बना हुआ था। सब लोग यह जानना चाह रहे थे कि क्या केजरीवाल का रूझान राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व की बात करने वाली भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा की ओर है या फिर राजनैतिक क्षितिज के दूसरी ओर धर्मनिरपेक्ष जनतांत्रिक राजनीति की बात करने वाले विपक्षी दलों की ओर है। लेकिन सारे चुनाव प्रचार-प्रसार के दौरान कहीं भी केजरीवाल ने अपनी वैचारिक और सैद्धांतिक पहचान का कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिया।

देशव्यापी विमर्श के मुद्दों में दिल्ली के मतदाताओं को करीब से छूता हुआ मुस्लिम महिलाओं के नेतृत्व में होने वाले शाहीन बाग का विरोध प्रदर्शन सबसे प्रमुख रहा। नागरिकता कानून (सीएए) के विरोध में होने वाले इस अनूठे और शांतिपूर्ण प्रदर्शन की चर्चा न सिर्फ सारे भारत में हुई बल्कि अमेरिका और यूरोप जैसे देशों से भी इस कानून के विरोध में समाचार आते रहे हैं। अपने चुनाव प्रचार के दौरान न तो केजरीवाल शाहीन बाग गए और न ही उन्होंने इस बारे में कोई बात कही। वास्तव में सीएए अधिनियम के विरोध में शाहीन बाग के प्रदर्शन पर केजरीवाल और उनकी पार्टी के नेताओं की मौनसाधना काफी आश्चर्यचकित करने वाली रही है। इसीतरह पिछले दिनो जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय (जेएनयू) में अध्यापकों और विद्यार्थियों पर अज्ञात हमलावरों द्वारा की गई हिंसा पर भी केजरीवाल ने चुप्पी साधी रखी। इस हिंसा को लेकर देश के तमाम बुद्धिजीवी वर्ग व आम लोगों ने भर्त्सना की। विद्यार्थियों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाने आई लोकप्रिय सिनेतारिका दीपिका पादुकोण का जेएनयू आना सारे मीडिया जगत में सुर्खियों का केन्द्र बना रहा। पर केजरीवाल इन सबसे अनभिज्ञ बने रहे जो कि काफी चौकाने वाली बात लगी।

मौजूदा दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा के विरुद्ध जीवन-मरण की लड़ाई लड़ने में व्यस्त अरविंद केजरीवाल की मौनसाधना को राजनैतिक चातुर्य मानकर आम जनमानस ने नजरअंदाज कर दिया। लेकिन चुनाव परिणाम आने के बाद भी जब उन्होंने शाहीन बाग के बारे में कुछ नहीं बोला तब तमाम तरह के कयास लगाए जाने लगे। अब यह कहा जा रहा है कि अरविंद केजरीवाल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की विचारधारा के हिमायती हैं और वह निकट भविष्य में आरएसएस की सहायता से प्रधानमंत्री पद पाने की लालशा रखते हैं। इसी के साथ यह भी प्रश्न उठ रहा है कि क्या वास्तव में दिल्ली चुनाव में सफलता प्राप्त करने के बाद केजरीवाल की महत्वाकांक्षा राष्ट्रीय राजनीति के मंच पर उतरने की हो गई है। खैर, यह देखना होगा कि क्या केजरीवाल अपनी महत्वाकांक्षा पर लगाम लगा पायेंगे या फिर से वही गलती दोहराएंगे जो उन्होंने पिछले चुनाव के बाद पंजाब की राजनीति के संदर्भ में की थी। अगर केजरीवाल को जननायक के रुप में राष्ट्रीय पटल पर उभरना है तो उन्हें यह स्पष्ट करना होगा कि उनकी राजनैतिक विचारधारा आखिर क्या है। कश्मीर में धारा 370, राम मंदिर मुद्दा, तीन तलाक, एनसीआर,एनपीआर तथा सीएए जैसे विवादित मुद्दे एवं आर्थिक मंदी तथा विदेश नीति के जैसे नीतिगत मसलों पर उनका रुख क्या है जिस पर उन्हें अपना विचार स्पष्ट रुप से व्यक्त करना होगा। एक ईमानदार अधिकारी की भाति कार्य करते हुए जनकल्याणकारी योजनाओं को सफल निष्पादन करते रहना एक अच्छी बात जरूर है लेकिन यह राजनीतिक भाष्य नहीं हो सकती है। इसके द्वारा सामाजिक वर्गों का जनसंपर्क संभव नहीं है और न ही इससे संभावित गठबंधन की राजनीति का सफर तय कर पाना संभव है।

इस मामले में अरविंद केजरीवाल को अपने पुराने सहयोगी प्रशांत किशोर का अनुशरण करना चाहिए। एक पेशेवर राजनीतिक रणनीतिकार की तरह व भाजपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी को सलाह देते रहे हैं लेकिन राजनीति में उतरने के बाद उन्होंने अपनी राजनीतिक विचारधारा एकदम स्पष्ट व्यक्त की और निर्धारित नीति से भटकने पर अपने नेता तथा जनता दल (यूनाइटेड) के प्रधान नीतीश कुमार से अपना विरोध प्रकट करने में कोई देरी नहीं की।  प्रशांत किशोर ने कहा कि “गोडसे और गाँधी एक साथ नहीं चल सकते” जैसा बयान काफी गंभीर था। अपने विचार को व्यक्त करने और प्रतिबद्धता दर्शाने वाले राजनेता के रूप में अपनी पहचान बनाने में काफी सफल रहे हैं। आने वाले समय में अरविंद केजरीवाल को यह तय करना होगा कि क्या वह एक सशक्त राजनेता के रूप में कार्य करेंगे या फिर महज एक प्रशासनिक अधिकारी के रूप में कार्य करेंगे। उन्हें तमाम वर्तमान तथा भविष्य में उठने वाले विभिन्न मुद्दों पर अपना विचार रखना होगा। मौनसाधना हर बार काम नहीं आएगी क्योंकि आज देश की राजनीति बहुत बदल गई है एक ओर दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी राजनीति है तो दूसरी ओर इसके विरोध में मध्यमवर्गीय वामपंथी झुकाव वाली प्रगतिशील धर्मनिरपेक्ष राजनीति है जो अभी भी समाजवादी अर्थव्यवस्था को समझ नहीं पाई है। जब तक अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी इन दो विचारधाराओं के संबंध में अपनी स्पष्ट सोच व प्रतिबद्धता व्यक्त नहीं करेंगे तब तक वह राजनैतिक विचारधारा जैसे जुड़े प्रश्नों के कटघरे में ही खुद को कैद पाएंगे। जहां से उनका न तो कोई जनाधार विकसित हो सकता है और न ही उनका कोई राजनैतिक प्रभाव बढ़ने कई संभावना नजर आती है। इसलिए यदि केजरीवाल को कटघरे से बाहर निकलना है तो जल्द ही कुछ ठोस प्रयास करने होंगे जो कि फिलहाल संभव नहीं लगता है। #

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