मीडिया मंथन : मीडिया को संतुलित व्यवहार प्रदर्शित करने की है आवश्यकता

 


ज के इस वर्तमान परिपेक्ष्य में हमारे सामने कई यक्ष प्रश्न मुंह बांए खड़े हैं। क्या समाज का विघटन हो रहा है? क्या मीडिया अपनी निष्पक्षता खो रहा है? क्या पुलिस न्यायाधीश की जगह ले सकती है? ऐसे कुछ गंभीर सवाल हे जो हमें सोचने का मजबूर कर देते हैं। दिल्ली में हुए निर्भया कांड के सात साल बाद दिसंबर 2019 में फिर एक ऐसी घटना घटी जो कि काफी संवेदशील और निंदनीय थी। यह घटना हैदराबाद में एक पशु चिकित्सक के साथ बलात्कार कर उसे जलाकर मार देने के रुप में सामने आई। इसमें कोई दो राय नहीं है कि यह घटना अमानवीय थी जिसके बारे में बात करने मात्र से ही इंसान की आत्मा कांप जाती है।

इस तरह के कृत्य क्रूर, अमानवीय और अकल्पनीय अपराध की श्रेणी में आते है लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि जिस तरह से इस मामले में जहां पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए नाटकीय अंदाज में एनकाउंटर करके न्याय किया, वह पुलिस व न्याय व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। दूसरी तरफ ज्यादातर टीवी मीडिया ने जिस तरह से कवरेज किया और भावनाओं में बहकर पत्रकारिता के मूल्यों को दरकिनार करते हुए समाज में उत्तेजना फैलाई। उससे एक बार फिर मीडिया की नैतिकता व मूल्यों पर बहस छिड़ गई है। कुल मिलाकर कहा जाय तो चाहे वह पुलिस व्यवस्था हो या फिर मीडिया दोनों को ही संतुलित व्यवहार करने की आवश्यकता है।

गैंगरेप के आरोपियों की हैदराबाद पुलिस द्वारा हत्या पर प्रतिक्रिया देते हुए निर्भया की मां ने कहा कि- “यह मेरे घाव के लिए मरहम जैसा था।इसी मामले में अपनी प्रतिक्रिया देते उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने कहा कि-“पुलिस की कार्रवाई सराहनीय है और उन्होंने न्याय किया है। वह कहती हैं कि अगर पुलिस ने निर्भया सामूहिक बलात्कार के मामले में इसी तरह की सख्त कार्रवाई की होती तो उसे जल्दी न्याय दिलाया जा सकता था।आम आदमी पार्टी (आप) के नेता संजय सिंह ने कहा किन्याय व्यवस्था से लोगों का विश्वास उठता जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि हैदराबाद पुलिस की कार्रवाई को कम नहीं आंकना चाहिए।

इस मामले से आक्रोशित जनता लगातार उन जघन्य अपराधियों की तत्काल फांसी की मांग कर रही थी। इसका दबाव न सिर्फ सरकार पर था बल्कि न्याय व्यवस्था पर भी था। पुलिस जब अपराध के दृश्य को फिर से रिक्रिएट करने के लिए चार कथित अपराधियों को घटनास्थल में ले गई तो वे चारो अपराधी वहां से भागने की कोशिश कर रहे थे जिसके चलते पुलिस को उनका एंकाउंटर करना पड़ा। इस बात में कितनी सच्चाई है यह तो जांच का विषय है लेकिन इस तरह से किया गया न्याय किसी भी नजरिये से सही नहीं ठहराया जा सकता। न्याय प्रक्रिया को एक न्याय प्रणाली से गुजरना पड़ता है। इस हिसाब से देखा जाय तो पुलिस का यह कृत्य अवैध लगता है जिसकी न सिर्फ निंदा होनी चाहिए बल्कि इसकी जांच भी होनी चाहिए। यदि इसमें पुलिसकर्मियों पर कोई मामला बनता है तो फिर उन्हें दंड भी दिया जाना चाहिए।

उत्साही एंकरों की टेलीविजन खबर पर आम लोगों के साथ-साथ प्रबुद्ध वर्ग ने भी आश्चर्यजनक रूप से अतिरिक्त न्यायिक हत्या का समर्थन करते दिखे। उत्सव का दृश्य, पुलिसकर्मियों को बधाई और मिठाई वितरण और स्वाद लेना क्या वांछनीय है? यह भी अमानवीय उल्लासपूर्ण प्रसारण तथ्य रूप में नहीं था। लेकिन जश्न के लिए एक पार्टी होने के नाते मीडिया अनसुनी रही। अखबारों को ऐसा करने के लिए कभी नहीं जाना जाता। टीवी चैनलों के लिए यह लगभग एक रूटीन है। उन्हें सार्वजनिक आक्रोश से बहकाया गया था। वे एक अवैध, अमानवीय और पशुवत कृत्य को लगभग सही ठहरा रहे हैं और समाज में समारोह हो रहा है। जिस तरह से प्रबुद्ध वर्ग ने भी न्याय को जायज ठहराया कम से कम वह चौंकाने वाला नहीं है। लोगों ने पुलिसकर्मियों पर फूलों की वर्षा की और उन्हें मिठाई खिलाई। मीडिया ने उन्मादी अनुमोदन को निभाया।

मीडिया को ना तो भावनाओं में बहना नहीं चाहिए और ना ही स्पष्ट रूप से गैरकानूनी कार्यवाही को सही ठहराना चाहिए। कानून कहता है कि जब तक आरोपी द्वरा किया गया अपराध सिद्ध नहीं हो जाता तब तक वह निर्दोष ही माना जाएगा। पुलिस ने मुकदमे के बिना ही अवैध न्याय प्रदान किया।

समाज और मीडिया अपनी आहत भावनाओं में बह गए। मीडिया भूल गया कि कुछ समय पहले गुडग़ांव में एक स्कूल के छात्र की हत्या के लिए पकड़े गए ड्राइवर ने पुलिस के उत्पीडऩ के तहत अपराध कबूल नहीं किया। सीबीआई जांच के बाद वह निर्दोष पाया गया। यह तर्क दिया जाता है कि न्याय व्यवस्था महिलाओं को न्याय नहीं दे रहा है और महिला के विरुद्ध अपराधों को बड़ी मजबूती और तेजी से रोकने की जरूरत है। वर्ष 2012 के निर्भया मामले के बाद से मीडिया ने यह भूमिका निभाई है लेकिन क्या मीडिया न्याय व्यवस्था या सभ्य समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी से बेखबर हो सकता है? प्रेस का काम कभी भी पुलिस, कार्यपालिका या प्रशासन की जगह लेना नहीं रहा है। चेलापति राव के नेतृत्व में नेशनल हेराल्ड ने प्रशासन और सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी के बीच एक रेखा खींच रखी थी बावजूद इसके कि वह कांग्रेस पार्टी के एक ट्रस्ट के सर्वेसर्वा थे। हेराल्ड ने पुलिस प्रशासन या सरकार को कभी भी बिना जांच के पास नहीं होने दिया।

इस मामले में मीडिया ने इस तथ्य की अनदेखी की कि चार की हत्या असली अपराधियों को बचाने के लिए एक छलावा हो सकती थी। बाद में मीडिया ने खुद को आंशिक रूप से सही किया। लेकिन उसमें समग्र रूप से परिपक्वता और सरसरी तौर पर इस तरह की कहानियों से निपटने की जरूरत नहीं दिख रही थी। लोगों को शिक्षित करने और सूचना देने के लिए एक संस्था के रुप में कार्य करने के बजाय मीडिया एक वाहक बन गया है। इस भूमिका को नागरिकता संशोधन विधेयक को लागू करने से लेकर विरोध प्रदर्शन करनेवालों से निपटने के लिए कानून बनाने तक के एक मुखर तरीके से देखा जा सकता है। सभी मुद्दों में मीडिया या तो आधिकारिक विचारों को बढ़ावा दे रहा है या प्रदर्शनकारियों के प्रभाव में है।

मीडिया की स्वतंत्र भूमिका गायब है। यह प्रवृत्ति बहुत आम हो गई है। इसका असर टेलीविजन समाचारों की गिरती दर्शक संख्या में देखा जा रहा है। टीवी मीडिया को पुनर्निवेश की आवश्यकता है यदि पुनर्निवेश नहीं है। अगर यह नहीं होता है तो टीवी मीडिया लंबे समय तक विज्ञापनों के लिए बना नहीं रह सकता। विज्ञापनदाताओं को को कोई नया मीडिया मिलेगा और टीवी मीडिया खुद को विलुप्त होने से नहीं बचा पायेगा। #

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