विकास गाथा : गाँधी की दृष्टि में समावेशी विकास


 हात्मा गाँधी ने जहाँ दक्षिणी अफ्रीका ने 1813 से 1914 तक के प्रवास में वहाँ के उपनिवेशवादी नस्लभेद, रंगभेद के विरुद्ध संघर्ष किया, तो 1920 से लेकर 1947 तक औपनिवेशिक दासता के विरुद्ध संघर्ष किया, तो 1920 से लेकर 1947 तक औपनिवेशिक दासता के विरुद्ध भारत के मुक्तिसंग्राम का नेतृत्व करते हुए उसे सफलता के मुकाम तक पहुंचाया। किन्तु ये बात सदैव ध्यान में रहनी चाहिए कि भारतीय सन्दर्भ में गाँधी के समस्त सत्याग्रह-संघर्षो का उद्देश्य केवल उसकी राजनितिक स्वाधीनता की प्राप्ति तक सीमित नहीं था। 

गाँधी जी तो ऐसे भारत का निर्माण करना चाहते थे जो राजनितिक रूप से स्वतंत्र होने के साथ-साथ उद्योग-धन्धो, भाषा, संस्कृति आदि की दृष्टि से भी आत्मनिर्भर एवं स्वाभिमानी हो तथा हिंसा एवं उपभोक्तावादी बाजारवाद से मुक्त हो। इसी परिकल्पना के उद्देश्य से उनकी आर्थिक दृष्टि थी कि-“सच्चा अर्थशास्त्र सामाजिक न्याय कि हिमायत करता है, वह सामान भाव से सबकी भलाई का, जिनमे कमजोर भी शामिल है, प्रयत्न करता है और सभ्यजानोचित सुन्दर जीवन के लिए है” महात्मा गाँधी के इस सूत्र वाक्य से यह स्पष्ट हो जाता है कि गाँधी कि समावेशी युक्ति नैतिकता की बुनियाद पर टिकी हुई है जिसमे शोषण की गुंजाईश नहीं है। 

गाँधी सर्वोदय के हिमायती थे और सर्वोदय का अर्थ ही होता है- “सबका उदय”, “सबका उत्कर्ष” और “सबका विकास”। कृष्णंदत ने दादा धर्माधिकारी कृत सर्वोदय दर्शन नामक पुस्तक की भूमिका में सर्वोदय की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया है, सर्वोदय का आदर्श है- अद्धैत और उसकी नीति है समन्वय। मानवकृत विषमता का वह निराकरण करना चाहता है और प्राकृतिक विषमता को घटाना चाहता है। गाँधीजी ऐसे विचार प्राय: व्यक्त करते रहे है। उन्होंने कहा “जब तक मुठ्ठीभर धनवानों और करोड़ो भूखा रहने वालो के बीच बेइंतहा अंतर बना रहेगा, तब तक अहिंसा की बुनियाद पर चलने वाली राज्य व्यवस्था कायम नहीं हो सकती।”

गाँधी की आर्थिक सोच उन गरीबो, बेसहारा लोगो की आर्थिकता से जुड़ी है जो आज की 'विकास की नवव्याख्या' में शामिल नहीं है। आज की “वर्चुअल इकनोमिक पॉलिसीज” जो “अवारा पूंजी” के खेल पर निर्भर है उसे भी गाँधी स्वीकार नहीं करते, बल्कि गाँधी श्रम पर आधारित पूंजी के विकास की बात करते है। इसीलिये शायद हम उनकी आर्थिक नीति में पूंजी के केन्द्रीयकरण की जगह विकेन्द्रीकृत पूंजी का ढांचा पाते है। वह पूंजी के मर्म को बखूबी जानते है। केंद्रित पूंजी तो हिंसा का कारक है। उसे मुनाफे के सिवाय और कुछ भी नहीं सूझता। उसकी दृष्टि में मनुष्य उपभोक्ता है और वे मुनाफे के लिये बाजार का सहारा लेकर केवल तीन जगह ध्यान केंद्रित करती है- उपभोक्ता, उत्पाद और बाजार। जाहिर-सी बात है की ऐसे वातावरण की आर्थिक योजना का लक्ष्य “मनुष्य का विकास” न होकर “पूंजी” के विकास पर केंद्रित होगा। भूमंडलीकरण के युग में आज यही हो रहा है। 

साम्राज्यवादी शक्तियों के “शक्ति संतुलन” की आजमाइश की होड़ ने विकास का मॉडल बदल दिया। विकास की जगह विनाश आसानी से देखा जा सकता है क्योकि विध्वंसक सोच ने विध्वंसक पूंजी व मशीन का सृजन करते हुए उसे अनीति के रास्ते ऐसे प्रवाहित किया कि भारत समेत दुनिया के तमाम देश भूख से जीवन तोड़ रहे है। 

प्रो. नंदकिशोर आचार्य लिखते है कि “गाँधीजी उस विशाल पैमाने के उत्पादन को ही विश्व संकट का मूल कारण मानते है जिसके लिये मशीनीकरण कि आवश्यकता बताई जाती है। यदि प्रौद्योगिकी मनुष्य में वही सत्ता हो जाती है तो वह अपने लिये मनुष्य कि स्वतंत्रता का दमन, उसकी शक्तियों का शोषण और उसकी गरिमा का हनन करती है।” 

गाँधी जी की तरह इवान इलिच भी आत्मनिर्भरता को महत्व देते है। उन्होंने अपने एक लेख में लिखा है- “आनंद वही रहेगा जहाँ व्यक्ति और समाज साथ-साथ चले। इसलिए आत्मनिर्भरता एक कुंजी है।” गाँधी की इस आर्थिक आत्मनिर्भरता से ही मनुष्य बाजार और उत्पाद का गुलाम होने की जगह वास्तविक सुखपूर्ण जीवन जी सकता है। महाराष्ट्र के किसानो ने अगर आज गाँधी के आर्थिक विकास के फार्मूले को अपना लिया होता तो वे आत्महत्या नहीं करते। गाँधी जी द्धारा लिखित “हिन्द-स्वराज” की मूल भावना को देश के सन्दर्भ में, देश की दबी-कुचली, ग्रामीण समाज की गरीबी के सन्दर्भ में, कृषि प्रधान राष्ट्र को नवोदय देने के सन्दर्भ में उनकी तत्काल जरूरतों के मुताबिक विकसित करने को बढ़ावा देने का प्रयोजन था। यह वर्ष 'हिन्द-स्वराज' के प्रकाशन का शताब्दी वर्ष है। जिसमे वर्णित गाँधी के समावेशी विकास की युक्तियों ने भारतीय जान में ऑक्सीजन फुँकने का कार्य किया। गाँधी के आर्थिक विचारो का आधार “विकेन्द्रीकरण का सिद्धांत” है। जिस प्रकार राजनैतिक सत्ता तभी कारगर हो सकती है जब सत्ता सच्चे अर्थ में लोगो के हाथो में हो (वोट देने का अधिकार मात्र नहीं) उसी प्रकार आर्थिक समृद्धि के लिए भी यह आवश्यक है कि हम गाँवो से उत्पादन प्रक्रिया शुरू करें, अगर गाँव समृद्ध होंगे तो देश स्वयं ही समृद्ध हो जावेगा।

गाँधी के आर्थिक स्वराज का स्वप्न था- सबका सामाजिक दर्जा एक हो, मजदूरी करने वाला वर्ग व स्वघोषित सभ्य समाज का दर्जा एक हो। पूंजी और मजदूरी के बीच के झगड़े बिलकुल समाप्त हो। गाँधी कहते है- “मेरी राय में भारत की, न सिर्फ भारत की बल्कि पूरी दुनिया की अर्थ रचना ऐसी होनी चाहिए कि किसी को भी अन्न और वस्त्र के अभाव की तकलीफ न सहनी पड़े... आर्थिक समानता, अर्थात जगत के पास समान सम्पति होना यानी सबके पास इतनी सम्पति का होना कि जिससे वे अपनी कुदरती आवश्यकताए पूरी कर सके।”

समावेशी विकास कि बहस में गाँधी कि ट्रस्टशिप कि अवधारणा एक बड़ी आर्थिक मानवाधिकारवादी अवधारणा साबित होती है क्योंकि वे न केवल धन के ठहराव को समाप्त करना चाहते है बल्कि मनुष्य को वॉलन्टियर भी बनाने की कोशिश करते है। उनकी दृष्टि में- “जब मनुष्य अपने आपको सेवक मानेगा, समाज की खातिर धन कमाएगा, समाज के कल्याण के लिये खर्च करेगा, तब उसकी कमाई में शुद्धता आएगी। उसके साहस में भी अहिंसा होगी। इस प्रकार की कार्यप्रणाली का आयोजन किया जाए तो समाज में बगैर संघर्ष के मूक क्रांति पैदा हो सकती है।”

इस नैतिक किन्तु अहिंसक क्रांति से यह कहना बिलकुल अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं होगा कि गाँधी हीगेल, मार्क्स व एडम स्मिथ के संरचना के आगे “गाँधीवादी आर्थिक ढांचा” की विशिष्टता कायम करने में सफल हो जाते है। उनके आर्थिक मॉडल में वर्ग या पूंजी के बीच का विश्लेषण नहीं है बल्कि स्मिथ के नैतिक मूल्यों को पूंजी से भी बाहर निकलकर सर्वोदयी संकल्पना को धरातल पर लाने के लिये उस अंतिम व्यक्ति की समृद्धि की चाह है जो विकेन्द्रीकृत पूंजी के माध्यम से संभव है।

यदि समग्रता में देखे तो उनके चार फार्मूले-अहिंसा, ट्रस्टशिप, विकेन्द्रीकरण और अंतिम व्यक्ति, आर्थिक मॉडल की चाभी है। एक सच्चाई यह भी है कि गाँधीजी इसके माध्यम से किसी विकास के मॉडल कि जीडीपी या जीएनपी निर्धारित करते हुए अपने हुनर (नव अविष्कार) को दुनिया के सामने नहीं प्रकट करना चाहते बल्कि उनका लक्ष्य सिर्फ और सिर्फ इंसान और इंसानियत है।

आजादी के तकरीबन 72 वर्ष बाद आज अनेक विसंगतियों, दुर्बलताओं, विफलताओं और असमानताओं के बावजूद देश प्रगति के जिस सोपान पर खड़ा है, गाँधी जी निश्चय ही उसके मूल में है। गाँधी कि समावेशी विकास दृष्टि कोई साफगोई से रही जाने वाली भू-मण्डलीकरण युग कि आर्थिक संरचना नहीं है बल्कि आर्थिक मानवाधिकारों का गतिमान व स्थायी आग्रह है साथ ही साथ मनुष्य की गरिमा की हिफाजत का अनुरोध भी है। विकल्प के रूप में संभव है कि दुनिया को एक दिन गाँधी कि ओर लौटना पड़े। #

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