सत्ता के गलियारों से : दिल्ली चुनाव परिणाम और भाजपा

 

राजनैतिक विश्लेषकों द्वारा दिल्ली विधानसभा के चुनाव परिणाम की समीक्षा में तमाम बिंदुओं पर प्रकाश डाला गया। राजनैतिक दलों के प्रतिनिधियों ने भी अपनी-अपनी बात जनता के सामने रखी। पर एक साधारण सी बात जो इन चुनाव परिणाम ने साफ की वह यह है कि आम आदमी पार्टी (आप) की प्रभावी विजय केवल मुस्लिम मतों से ही संभव नहीं हुई। बहुसंख्यक हिंदू समाज के सब वर्गों ने भी आम आदमी पार्टी को भारी मतदान किया। जिसका मतलब यह है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा हिंदू मतदाताओं के ध्रुवीकरण के सारे प्रयास असफल रहे हैं। 

वास्तव में इस चुनाव का सबसे बड़ा संदेश चुनावी रणनीति में ध्रुवीकरण के प्रयासों की विफलता ही है। यह बात न केवल मतदाता का सोच दर्शाती है बल्कि हमें पिछले वर्षों में विभिन्न राजनीतिक दलों की चुनावी राजनीति का पुनर्लोकन करने के लिए भी प्रेरित करती है। क्या वर्ष 2014 और फिर 2019 में लोकसभा के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के अप्रत्याशित विजय उसकी हिंदुत्ववादी छवि के कारण थी? क्या आज विपक्षी दल दोनों चुनाव में इसलिए पूरी तरह असफल रहे क्योंकि वह भाजपा की हिंदू ध्रुवीकरण की रणनीति के सामने मतदाता का समर्थन प्राप्त करने में असमर्थ थे।

यदि पिछले छह-सात वर्षों की राजनीति का गंभीर आंकलन किया जाए तो हम पाते हैं कि हिंदू मतदाताओं के ध्रुवीकरण की बात पर भाजपा और विपक्ष दोनों ने ही आवश्यकता से अधिक विश्वास किया तथा इसके साथ-साथ मतदाताओं की मानसिकता का दोषपूर्ण आंकलन भी किया। भाजपा यह समझती रही कि हिंदुत्ववादी नीतियों के कारण मतदाता उनकी पार्टी के साथ आ रहे हैं और विपक्षी दल यह समझते रहे कि उनके जनसमर्थन के हास का कारण भाजपा द्वारा देश की राजनीति का साम्प्रदायीकरण करना था। लेकिन सच तो यह है कि चाहे पक्ष हो या विपक्ष दोनों ही आधा-अधूरा ही सच देख पा रहे थे।

अपने बारे में चाहे कोई भी दावे क्यों ना करें इसमें कोई संदेह नहीं कि वर्तमान नेतृत्व के अंतर्गत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रभाव में भाजपा पूरी तरह से एक साम्प्रदायिक दल बन गई है जो अपने हिंदुत्ववादी दर्शन के कारण अल्पसंख्यकों से कट गया है। इसी दर्शन के अंतर्गत संघ परिवार ने मध्ययुगीन तथा आधुनिक भारत के इतिहास का एक नया भाष्य विकसित किया है जो कि काफी हद तक असत्य के साथ-साथ एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित है। संघ परिवार के सदस्य और उसके समर्थक इस भाष्य की मान्यताओं को ब्रम्ह वाक्य मानते हैं और साथ ही साथ यह भी समझते हैं कि सारा हिंदू समाज उनसे इस बात पर सहमत है।

भाजपा की समस्या का मूल आधार इस सोच द्वारा उत्पन्न अति सीमित दृष्टिकोण है जो अब उनके पांव की बेड़ियां बनकर उनके मार्ग का सबसे बड़ा अवरोधक बन रहा है। अगर भाजपा के नेता और समर्थक यह समझते हैं कि इसी सीमित और जड़ दृष्टिकोण के कारण पिछले वर्षों में उन्हें चुनावी सफलता मिली है और भारत का बहुसंख्यक मतदाता उनके इस दर्शन का समर्थक है तो यह उनकी बहुत बड़ी भूल है। वास्तव में दस वर्ष के डॉ. मनमोहन सिंह के कांग्रेस शासन के बाद भाजपा का चुनाव में बड़ी सफलता प्राप्त करके सत्ता में आना नरेंद्र मोदी की कट्टर हिंदूत्व और मुस्लिम विरोधी छवि के साथ-साथ और भी अन्य कई आकांक्षाओं का संकेत था। डॉ. मनमोहन सिंह विद्वान, ईमानदार और अच्छे प्रशासक थे पर उनमें उस राजनैतिक ऊर्जा का अभाव था जिसको तीव्र गति से विकास की आशा करने वाले युवा वर्ग देख रहा था। इसके साथ ही साथ उनमें तथा कांग्रेस के अन्य बड़े नेताओं में राजनैतिक कौशल का घोर अभाव था। राजनैतिक कौशल वाले कांग्रेसी नेताओं ने या तो पार्टी छोड़कर अपने-अपने अलग क्षेत्रीय राजनैतिक दल बना लिए थे या फिर किसी कारणवश निष्क्रिय पड़े रहे। उर्जाविहीन कांग्रेस और उसके अनुभवहीन नेता तथा जमीनी हकीकत से दूर कांग्रेसी कार्यकर्ता किसी भी संगठित तथा ऊर्जावान नेतृत्व से चुनाव हार सकते थे। वह भाजपा की रणनीति समझने में असफल थे। भ्रष्टाचार के झूठे और सच्चे आरोपों ने पूरी तरह से यू.पी.ए. की लुटिया डुबो दी। अगर नरेंद्र मोदी की जगह राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज, नितिन गडकरी जैसा कोई भी अन्य नेता भाजपा का नेतृत्व कर रहा होता तब भी  कांग्रेस और यू.पी.ए. की हार सुनिश्चित थी। 

देश के मतदाताओं के पास कांग्रेस नेतृत्व के निष्क्रिय और ऊर्जाविहीन होने के बाद भाजपा को छोड़कर और कोई विकल्प मौजूद न था। उदारवादी आर्थिक व्यवस्था और भूमंडलीकरण विश्व में कम्युनिस्ट और समाजवादी दल की सार्थकता पर वैसे ही प्रश्नचिन्ह लग गया था। सामंतवाद के विरुद्ध सफल संघर्ष करने के बाद मुलायम सिंह और लालू प्रसाद यादव जैसे नेता सामंती हो गए और परिवारवाद ने उनके दलों के जनाधार को अति संकुचित कर दिया। भावनात्मक नारों पर आधारित वाकपटुता वाले भाजपाइयों का चुनावी रणक्षेत्र में सामना करने पर अगर वह पराजित हुए तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं थी।

कांग्रेस, साम्यवादी दलों, मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव और मायावती की खामियों के कारण भाजपा को सत्ता का लाभ अवश्य हुआ पर पश्चिमी बंगाल, उड़ीसा, तमिलनाडु, केरल, तेलांगना तथा आन्ध्र पदेश जैसे राज्य में जहां पर क्षेत्रीय नेतृत्व सक्षम या भाजपा की दाल कभी नहीं गली। पर केंद्र में सत्ता प्राप्त करने के उन्माद ने न कभी अपनी वास्तविक स्थिति का आंकलन किया और न ही उत्तर भारत में अपनी सफलता के पीछे विपक्ष की निष्क्रियता को कारण माना। भाजपा इस चुनावी सफलता को अपने हिंदुत्ववादी दर्शन की भारतव्यापी स्वीकृत तथा नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व का चमत्कार मानती रही। भाजपा के नेता व उसके अंधभक्त तथा अबौद्धिक समर्थक यह नहीं समझ पाए कि नरेंद्र मोदी युगपुरुष न होकर राजनैतिक परिस्थितियों का करिश्मा है और उनका हिंदुत्व तथा मुस्लिम द्वेष कोई नई विचारधारा न होकर सत्तर वर्ष पुराना वीर सावरकर और गुरु गोलवालकर का राजनैतिक नजरिया है।

भारत की जनतांत्रिक राजनीति सदैव व्यक्ति पूजा पर आधारित रही है चाहे वह पंडित नेहरू, सरदार पटेल, डॉ. अबेड़कर या फिर अन्नादुरे, एम. जी. आर, चौधरी चरण सिंह, एन. टी. रामाराव, लालू प्रसाद यादव, मायावती ही क्यों न हों। नरेंद्र मोदी ने महज इस परंपरा को आगे बढ़ाया और अमेरिकी प्रणाली पर दल को पीछे छोड़कर अपने व्यक्तित्व को दल का पर्याय बनाया। पर इससे उनकी व्यक्ति के स्वीकृति तो बढ़ी पर उनका राजनैतिक दर्शन भी लोगों ने आत्मसात किया हो ऐसा नहीं हुआ।

दिल्ली चुनाव में समस्त संसाधन झोकने के बावजूद और निदंनीय साम्प्रदायिक प्रचार सभी निम्नतम मानकों को छूने के बाद भी अगर भाजपा को पराजय का मुंह देखना पड़ा है तो भाजपा और उसके नेतृत्व को यह समझना आवश्यक है कि हमारा समाज साम्प्रदायिक विभाजन, द्वेष और ऐतिहासिक पुरुषों के त्रिरस्कार के लिए तैयार नहीं है। तमाम सामाजिक-धार्मिक मुद्दों पर देश के बहुआयामी समाज के आधारभूत चिर-परिचित और परंपरागत मूल्यों पर कुठाराघात स्वीकार्य नहीं है। अब समय आ गया है कि संघ परिवार और भाजपा दिल्ली चुनाव परिणामों से यह पाठ सीखकर अपना वैचारिक दुराग्रह दूर करे जो कि  “भाजपा” के स्वस्थ्य राजनैतिक भविष्य के लिए यह महती आवश्यकता है। #

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