विचार - विमर्श : महात्मा गाँधी की दृष्टि में सभ्यता की अवधारणा

 

भ्यता एक व्यापक अवधारणा है जिसका आधार “सभ्य” है। सभ्य का अर्थ सभा का, सभा से, संबंध, सभा के योग्य, शिष्ट, संस्कृत, नम्र, विश्वस्त, पंच न्याय करने वाला कुलीन व्यक्ति, भृत्य आदि है। सभ्य का विशेषण है सभ्यता-जिसका आशय है शिष्टता, नम्रता, भद्रता, कुलीनता, किसी देश या जाति की बाह्य तथा भौतिक समृद्धि और पर विशेषताओं का सामूहिक रूप। संकट का अर्थ है-तंग, घनीभूत, संकीर्ण, घना खतरनाक, तंग रास्ता, दर्ग, कठिनाई, खतरा, विपति, मुसीबत, भीड़ आदि। महाशय हर्डर हेगेल, कॉम्टे, मार्क्स, वीको, स्पेंगलर, टायनबी, सोरोकिन, गाँधी आदि आदि विचारकों सभ्यता संबंधी विचार में भिन्नता दिखती है। इस आलेख में मूलत: गाँधी दृष्टि का चिंतन अभीष्ट है।

सभ्यता का आशय

गाँधी दृष्टि में सभ्यता का आशय मात्र किसी क्षेत्र, राष्ट्र, जाति की बाह्य तथा भौतिक समृद्धि एवं परम्परागत विशेषताओं का सामूहिक रूप ही नहीं है वरन उसका आधार नैतिकता और आध्यात्मिकता है। पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति-जिसका संबंध भौतिक वस्तुओं की वृद्धि और खोज से रहा है-के गाँधी जी आलोचक हैं। गाँधी की सभ्यता की अवधारणा भारतीय आध्यात्मिक संस्कृति के आधार पर आधारित एवं नैतिक विकास के आधार पर विकसित हुई दिखती है।

गाँधी हिन्द स्वराज्य में लिखते हैं कि सभ्यता आचरण का वह रूप है जो मनुष्य को कर्तव्य का मार्ग दिखलाती है। कर्तव्यों का पालन और नैतिकता का पालन-दोनों परिवर्तनीय पद हैं। ऐसी प्रक्रिया के द्वारा हम अपने को जान पाते हैं। इसीलिए “सभ्यता” का गुजराती अनुवाद “उत्तम आचरण” है, सभ्यता का पर्यायवाची शब्द उतम आचरण उच्चरता है। गाँधी जी की सभ्यता अवधारणा से यह स्पष्ट होता है कि:

  1. गाँधी जी सभ्यता की व्याख्या नैतिक पद के रूप में करते हैं।
  2. गाँधी जी सभ्यता की व्याख्या वस्तुत: संस्कृति की ही व्याख्या है।
  3. गाँधी जी की नैतिकता के आधार पर सभ्यता की व्याख्या में व्यक्ति के जीवन के परिष्कार पर विशेष बल है।

हिन्द स्वराज एवं सभ्यता का संकट

महात्मा गाँधी हिन्द स्वराज में कहते हैं कि पाश्चात्य सभ्यता का आधार आध्यात्मिक अनुभव की प्राप्ति न होकर भौतिक वस्तुओं का संग्रह है जो मानव को वास्तविक जीवन की दिशा में गतिशील होने से ना केवल रोकता है बल्कि सभ्यता और संस्कृति के नाम पर मनुष्य और समाज में विकृति उत्पन्न करता है। इससे व्यक्ति में भौतिकवादिता, समाज में अनैतिकता और अधार्मिकता को आश्रय प्राप्त हो रहा है।

वर्तमान सभ्यता का आधार भोग, बड़े पैमाने का उत्पादन, केन्द्रीकरण, यंत्र पूजा एव। शस्त्र निष्ठा है। परिणाम संवाद की जगह विवाद सेवा की जगह परिग्रह, मानव की जगह यत्र लोक की जगह तंत्र लेता जा रहा है। व्यक्ति की आत्म शक्ति का हास, उत्तम, जीवन व्यतात, करने के प्रति अनिच्छा, वास्तविक आनंद की अनुभूति के प्रति अनाकर्षण, स्वतंत्रता का हास, बता में वृद्धि, उत्पादन उपभोग के बदले बाजार के लिए, नीड का स्थान ग्रीड, प्रोडक्शन मॉसेस के बदले मॉस प्रोडक्शन की प्रवृतियों का संवर्द्धन हो रहा है। व्यक्ति परिधि में वस्तु (पदार्थ) केन्द्र में आ गया है। लोग अनैतिक हो रहे हैं, अधार्मिक हो रहे हैं- यह उतना चिंता का विषय नहीं है, जितना कि नैतिकता एवं धार्मिकता पर से आस्था का उठना है।

केन्द्र बिन्दु व्यक्ति : परिधि पदार्थ

गाँधी जी के चिंतन में व्यक्ति प्रधान एवं पदार्थ गौण दिखता है। उनके चिंतन के केन्द्र में व्यक्ति एवं परिधि में पदार्थ दृष्टिगोचर होता है। उनकी मान्यता है कि मनुष्य एवं समाज के दो रूप है- 1. व्यक्त रूप और 2. अव्यक्त रूप। व्यक्त रूप में ये ससीम तथा गुण-दोषों से परिपूर्ण हैं, समग्र सामाजिक चिंतन की व्याख्या मात्र व्यक्त रूप के आधार पर नहीं की जा सकती। वरन् इसके लिए व्यक्ति को सभाव्य शक्ति की ओर जाना ही होगा- जो अपने आप में व्यापक है। संभाव्य रूप में मानव स्वभाव शुभ है। वह अहिंसक है, समाज में प्रेम और सहयोग चाहता है। वह आत्मा के लिए योग, शरीर के लिए उद्योग, समाज-राष्ट्र के लिए सहयोग की प्रवृत्ति रखता है। उसमें सत्य, प्रेम, करूणा का वास, निर्वेरता, निर्भरता, निष्पक्षता का प्रवाह और सृजन तथा विसर्जन का संचार है।

सभ्यता का संचार

गाँधी जी की “सभ्यता का संवर्धन का चिंतन” अहिंसा प्रेम, सहयोग के आधार पर अवलम्बित दिखता है। उनकी मान्यता है कि सभ्यता की प्रक्रिया में शैने: शैने: अहिंसक शक्ति का विकास होता आ रहा है। उनका विश्वास है कि इस दिशा में उसका विकास जारी रहेगा। इस संदर्भ में वे हरिजन में लिखते हैं, “बहत पहले हमारे पूर्वज नरभक्षी थे। उसके बाद ऐसा समय आया कि वे नर भक्षण से उबकर शिकार पर जीने लगे। उसके बाद मनुष्य इस स्तर पर आया कि वह घूमते हए शिकारी जीवन को लज्जा की दृष्टि से देखने लगा। इसलिए वह खेती करने लगा और मख्य रूप से भोजन बनाने के लिए पृथ्वी माता पर आश्रित हो गया। इस प्रकार उसने बंजारे की जिन्दगी को पार कर सभ्य और स्थिर जीवन को प्राप्त किया। फिर गावा और शहरों की स्थापना की और एक परिवार के सदस्य से एक समुदाय, राष्ट्र का सदस्य हुआ।” गाँधी जी अपने विचार को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं “ये सभी प्रगतिशील अहिंसा रविनाशवान हिंसा के परिचायक हैं। यदि ऐसा नहीं हुआ तो मानव जाति अब तक समाप्त गई होती जिस प्रकार अन्य कई छोटी जातियाँ विलुप्त हो गईं।”

गाँधी जी मान्यता है कि “मनुष्य एक पशु के रूप में हिंसक है, लेकिन आत्मा के रुप में वह अहिंसक है। जैसे ही वह अन्दर की आत्मा को जगा पाता है, वैसे ही वह हिसार हा रह जाता। या तो उसका विकास अहिंसा की ओर होता है। या वह विनाश को प्राप्त करता है। गाँधी जी का विश्वास है कि- “यदि हम यह विश्वास करते है कि मनुष्य अहिंसा ही लगातार प्रगति कर रहा है तो इससे निष्कर्ष निकलता है कि आगे भी यह अहिंसा की प्रगति करता रहेगा।”

इंडियन होम रूल में गाँधी जी लिखते है कि “जैसे-जैसे मनुष्य अहिंसक होता है. वैसे-वैसे वह ऐसी संस्थाओं एवं मूल्यों की स्थापना करने लगता है जिसमें शोभा मात्रा धीरे-धीरे कम होने लगती है और प्रत्येक व्यक्ति को आत्मशक्ति, स्वतंत्रता एवं को अनुभूति होती जाती है।”

पाश्चात्य सभ्यता के विरोध का आधार-पाँच सूत्र

गाँधी हिन्द स्वराज में पाश्चात्य सभ्यता की कटु आलोचना करते है। इस आलोचना का आधार पाश्चात्य प्रजातंत्र, भारी मशीन, न्याय व्यवस्था, स्वास्थ्य व्यवस्था एवं नगरी सभ्यता है। उनकी मान्यता है कि इन सबसे शोषण एवं हिंसा को पोषण मिलता है।

  1. पाश्चात्य प्रजातंत्र : विद्यमान सभ्यता में प्रजातंत्र को सर्वोत्तम राज्य व्यवस्था का दर्जा दिया जाता है। लेकिन परोक्ष प्रजातंत्र में व्यक्ति को उचित पोषण नही मिल पाता है। इसीलिए गाँधी ने ब्रिटिश प्रजातंत्र को बंध्या और वेश्या के समान माना है। इसका आधार वोट एवं अल्पमत-बहुमत है। वस्तुत: वास्तविक आधार वोट नहीं व्यक्ति की भागीदारी एवं साझेदारी है।
  2. भारी मशीन : भारी मशीन यानी मारक मशीन। इससे बेरोजगारी की समस्या उत्पन्न होती है। यह हाथ का काम एवं मुँह की रोटी छीन लेती है। मानव यंत्रवत होता जाता है। उसकी स्वतंत्रता खंडित हो जाती है।
  3. स्वास्थ्य व्यवस्था : दवाईयों से रोगी का वास्तविक इलाज न होकर उसके शरीर पर अनावश्यक रूप से बोझ बढ़ाया जाता है तथा इसके लिए अनेक जीवों की हत्या की। जाती है।
  4. न्याय व्यवस्था : वर्तमान न्याय व्यवस्था में अधिवक्ता लोग न्याय दिलवाने के बदल। अपराधों का समर्थन करते हैं जिससे समाज रचना टूटती है। व्यक्ति-व्यक्ति का विरोध बढ़ता है।
  5. नगरी व्यवस्था : यह व्यवस्था न केवल व्यक्ति से व्यक्ति को दर करती है वरन उस प्रकृति से भी दूर कर देती है। पर्यावरण को प्रदूषित करती है।

विकल्पतः गाँधी जी ने विद्यमान प्रजातंत्र के स्थान पर रामराज जिसे विनोबा ने ग्राम स्वराज्य एवं लोकनायक जे.पी. ने लोक स्वराज्य कहा पंचायती राज का सझाव दिया है। भारी मशीन के स्थान पर तारक यंत्र एवं कटीर उद्योग की प्राथमिकता, न्याय व्यवस्था क स्थान पर पंचायती राज एवं नगरी व्यवस्था के स्थान पर ग्रामीण व्यवस्था जिसे जे.सी कुमारप्पा ने मातृ व्यवस्था तथा स्वास्थ्य व्यवस्था के तहत प्राकृतिक व्यवस्था का सुझाव दिया है।

व्यष्टि से समष्टि की यात्रा

व्यक्ति की अहिंसक चेतना का रूपान्तर समाज रचना के क्षेत्र में संस्था के रूप में भी होता है। संस्थाओं के विकास में गाँधी जी स्वीकार करते हैं कि उनका विकास अधिक से अधिक शोषणहीन संस्था की ओर होता है। जब संस्थाएँ शोषणमुक्त हो जायेगी तो फिर पारिवारिक व्यवस्था, राष्ट्रीय व्यवस्था और विश्व व्यवस्था में कोई अंतर नहीं रह जायेगा। तब राष्ट का नियम विश्व का नियम में परिणत हो जायेगा।

गाँधी जी की मान्यता है कि प्रत्येक व्यक्ति में सदवृत्ति एवं कृवृत्तियां होती ही है जिनमें हमेशा संघर्ष चलता रहता है- विजय सद्वृत्तियों की ही होती है- सत्यमेव जयते। वे मानते हैं कि प्रकृति में भी विरोधी तत्व होते हैं, लेकिन अंतिम रूप में प्रकृति का अस्तित्व आकर्षण, प्रेम, सहयोग पर ही कायम रहता है। अत: मनोवैज्ञानिक संघर्ष में व्यक्ति का विकास प्रकृति से संस्कृति की ओर होता है। वह आत्मविश्वास, आत्मविश्लेषण द्वारा अपनी कृवृत्तियों पर विजय हासिल करता जाता है और धीरे-धीरे उसका स्वभाव अहिंसा की ओर बढ़ता जाता है।

गाँधी जी के अनुसार सभ्यता का विकास न तो शोषक और शोषितों के बीच संघर्ष की कहानी है (जैसा की हेगेल मानते हैं) बल्कि वह मनुष्य की पाशविक एवं हिंसक शक्ति तथा आत्मिक शक्ति या प्रेम शक्ति के बीच संघर्ष की कहानी है। इस संदर्भ में प्रत्येक व्यक्ति की विजय हो इसके लिए प्रयत्न करना है। वास्तविक अर्थ में यही स्थिति स्वराज्य की है।

गाँधी जी की यह मान्यता है कि “...यह विश्वास करना कि जो भूत में नहीं हुआ है। वह भविष्य में भी नहीं होगा- मानव की गरिमा में अविश्वास करना है।” अत: भविष्य के समाज के विषय में नैतिक विकास की कल्पना की जा सकती है। गाँधी चिंतन न तो नियतिवादी है ना तो चक्रकार। इतना ही नहीं वरन् इनका चिंतन वर्गसा के चिंतन जैसा दिशाहीन भी नहीं है, बल्कि इनके चिंतन को लम्बरूपी विकास कहा जा सकता है। लेकिन यह लम्बरूपी विकास हेगेल और अलेकजेंडर के विचारों से पृथक है क्योंकि इसमें नियतिवाद का कोई स्थान नहीं है। सत्य तो यह है कि गाँधीजी का चिंतन प्रयोजनवादी एवं समन्वय से ओतप्रोत है।

अनुस्मरण-अनुचिंतन

गाँधी जी के सभ्यता दर्शन में मानव जीवन के समग्र पक्षों के चिंतन के साथ नैतिकता की प्रमुखता दृष्टि-गोचर होती है। अत: इनके चिंतन में पाश्चात्य का की एकांगिता एवं प्रदशर्नप्रियता का सदा अभाव एवं भारतीय संस्कृति का प्रभाव दिखता है। इनके चिंतन में व्यक्ति और समाज शैने:-शैने: आपस की दूरियों से स्वतंत्र होकर पूर्णता की ओर बढ़ता दिखता है। इस एकत्व भावना की पूर्णता केवल अंतराष्ट्रीय भावना को अनुभूति से होती दिखती है। इनके चिंतन में भगोल की दृष्टि से मीलों की दूरी एवं समाजर की दृष्टि से दिलों की दरी पाटने की पूरी व्यवस्था है। अतएवं गाँधी-चिंतन को एक ऐसा चिंतन कहा जा सकता है जो “संयमः खलु जीवनम्”, “निज पर भी अशासन” सर्वभत हिते रताः, “आत्मवत सर्वभूतेषु”, तत्व पर आधारित है अध्यात्म के साथ-साथ राजनीति, अर्थनीति, समाजनीति आदि का समवेत समामेलन की इस चिंतन पर आधारित समाज में व्यक्ति आत्मशक्ति की अनुभूति करते हुए उतम जीवन सकेगा, वास्तविक आनंद तथा स्वतंत्रता का अनुभव करते हुए मानव जीवन का लक्ष्य पान कर सकता है। #

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