विचार - विमर्श : आ अब लौट चलें... गाँधी की डगर पर


वरात्रि, विजयादशमी और दीपावली जैसे कई महत्वपूर्ण हिंदी पर्व अक्टूबर माह में होते हैं। जिनको देश का बहुसंख्यक समुदाय बहुत ही आनंद और हर्षोल्लास के साथ मनाता है। राजनीतिक नजरिये से भी अक्टूबर माह का बड़ा महत्व है। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के साथ-साथ सरदार पटेल, जयप्रकाश नारायण तथा लाल बहादुर शास्त्री जैसे कई बड़े नेताओं और आधुनिक भारत के निर्माताओं का जन्म भी अक्टूबर माह में ही हुआ। इस माह में समाजवादी आंदोलन के अविस्मरणीय सेनानी रहे डॉ राम मनोहर लोहिया तथा महान नेत्री प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी की पुण्यतिथि भी पड़ती है।

महात्मा गाँधी की 150वीं वर्षगांठ होने के कारण इस वर्ष के 2 अक्टूबर का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। इन सभी नेताओं का स्वतंत्रता संग्राम व स्वतंत्रता के बाद राष्ट्र निर्माण में बहुत महत्वपूर्ण योगदान रहा है। अपनी समस्त क्षमताओं के साथ इनके निस्वार्थ त्याग और बलिदान के कारण ही आज हम एक उन्नतशील भारत के गौरवशाली नागरिक बन पाए हैं।

स्वतंत्रता संग्राम तथा उसके बाद देश के निर्माण में कई ऐसे भी असंख्य लोगों का योगदान रहा है जिनका नामो निशान कहीं नहीं दिखाई देता। आज से लगभग 72 वर्ष पूर्व हमें ब्रिटिश साम्राज्यवाद से स्वतंत्रता मिली। अपने लगभग 200 वर्षों के औपनिवेशक शासनकाल में ब्रिटेन ने भारत के आर्थिक संसाधनों का काफी बुरी तरह से दोहन करता रहा। वर्ष 1939 से 1946 तक चले द्वितीय विश्व युद्ध में आर्थिक शोषण की प्रक्रिया और भी तेज हो गई। जब अंग्रेजों ने भारत छोड़ा तब हमारी अर्थव्यवस्था जर्जर और मृत प्राय थी। देश के विभाजन की विभीषका ने इसे और भी अधिक कमजोर कर दिया। परन्तु हमारे देश के नेताओं की दूरदर्शिता तथा जन सहयोग के कारण स्थिति में सुधार हुआ और योजनाबद्ध विकास ने गरीबी तथा भुखमरी से त्रस्त जनमानस में आशा का संचार किया। लगभग शून्य से विकास कर हम अपेक्षाकृत थोड़े ही समय में एक विश्व शक्ति बनकर सब के सामने उभरे। भारत की इस अद्भुत विकास यात्रा के पीछे समाज के सभी वर्गों का योगदान रहा।

जहां हमारे राजनीतिक वर्ग ने देश को एक रचनात्मक विकास की लोकतांत्रिक राह दिखाई वहां पर उनसे कुछ भूल भी हुई। फिर भारत जैसे विशाल देश के बहुवचनीय समाज में वैचारिक मतभेद और टकराव होना तो स्वाभाविक बात है। सामंतवाद, जातिवाद और रूढ़िवाद जैसी मानसिकता से उभर रहे समाज में आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर मतभेद होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। लेकिन समाज में समरसता, सामंजस्य तथा शांति बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि हम मतभेदों और विचारों के टकराव के बावजूद भी हमने एक साथ रहना व चलना सीखा। जो कि लोकतंत्र की मूल भावना में भी यही बात निहित है और इसी के माध्यम से ही संपूर्ण समाज का विकास संभव है।

विगत कुछ वर्षों से हमारे समाज में असहिष्णुता, घृणा, टकराव, हिंसा तथा धर्मांधता की प्रवृत्ति में इजाफा हुआ है। यह एक चिंताजनक बात है। लेकिन इससे भी अधिक चिंता का विषय यह है कि देश का शीर्ष नेतृत्व वर्ग इसकी रोकथाम के लिए कोई समुचित प्रयास करता नहीं दिख रहा। इसके विपरीत सत्तारूढ़ दल के कुछ नेता इस तरह की सोच को बढ़ावा देकर उसका राजनीतिक लाभ उठा रहे हैं। राजनीतिक लाभ कि इस ललक में जहां एक ओर क्षेत्र, जाति तथा धर्म के मुद्दों को उभारा जा रहा है वहीं दूसरी ओर तार्किक चिंतन और वैज्ञानिक सोच का गला भी घोटा जा रहा है।

यह अत्यंत दुख का विषय है कि इस तरह की आत्मघाती और नकारात्मक सोच की प्रवृत्तियों का विरोध करने के स्थान पर मीडिया भी इनको आश्रय और प्रोत्साहन दे रहा है। इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि जहां एक ओर हमारा देश सूचना तकनीकी, सौर ऊर्जा, अंतरिक्ष विज्ञान जैसे क्षेत्रों में लगातार आगे बढ़ता जा रहा है वहीं दूसरी ओर हम सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन में वैज्ञानिक स्वभाव, तार्किक चिंतन तथा विश्लेषण क्षमता को भी लगातार खोते जा रहे हैं। इसका सीधा प्रभाव हमारी शिक्षा व्यवस्था पर पड़ रहा है। जिसके परिणामस्वरूप कौशल और तकनीकी में दक्ष हमारी नई पीढ़ी सामाजिक चेतना खोती जा रही है। जिज्ञासा की ललक के अभाव में मौलिकता का हास हो रहा है। मौलिकता और जिज्ञासा के इसी अभाव के कारण हमारा इतिहास बोध भी शून्य हो गया है। जिसका लाभ राजनीति के निहित स्वार्थ अपने छोटे हितों के लिए उठाते हैं। इस तरह से देश और समाज के निर्माण की प्रक्रिया बाधित होती है।

आज एशिया महाद्वीप के तमाम छोटे-बड़े देश विकास की राह पर तेजी से अग्रसर हो रहे हैं और हम अभी भी मंदिर-मस्जिद, दलित-सवर्ण, पप्पू-फेकू, हिंदू-मुस्लिम तथा राष्ट्रवादी और राष्ट्रद्रोही जैसे फिजूल के मुद्दों में उलझे पड़े हुए हैं। भारत के एक बहुत बड़े मानव आबादी की असीम कार्य शक्ति और उसकी उत्पादकता का निरंतर हास हो रहा है। जो कि हमारे लिए शर्म की बात है। बांग्लादेश जैसा छोटा देश अपनी सीमित संसाधनों के बावजूद भी विकास की दौड़ में भारत से कहीं आगे है।

हम चाहे कितनी ही बड़ी-बड़ी बातें क्यों न करें लेकिन सच तो यह है कि आज हम अपने देश के एक बहुत बड़े वर्ग को सामान्य जीवन की मूलभूत सुविधाएं देने में असफल रहे हैं। इसके अलावा एक कड़वा सच यह भी है कि हमारी विकास दर और उत्पादन क्षमता में निरंतर गिरावट आ रही है। जिसके कारण देश में बेरोजगारी का दानव दिनोंदिन विकराल रुप लेता जा रहा है। जो कि काफी चिंता का विषय बनी हुई है।

ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि हम अर्थहीन वैचारिक टकराव जल्द से जल्द को समाप्त करें। पक्ष-विपक्ष के दुर्भावनापूर्ण प्रचार-प्रसार पर रोक लगाएं। इसके साथ-साथ ऐतिहासिक संदर्भों का उपयोग सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने, आत्मविश्वास जगाने और सही प्रेरणा प्राप्त करने के लिए करें। ना कि एक-दूसरे पर छींटाकशी करके अपना और देश के जनमानस की तमाम उर्जा व वक्त का हास करने का प्रयास करें।

किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोधी पक्ष की आलोचना करना वांछनीय शर्त है लेकिन वह गरिमापूर्ण होनी चाहिए। इसके लिए शीर्ष नेतृत्व का यह उत्तरदायित्व बनता है कि वह सुनिश्चित करें कि कोई आलोचना मर्यादापूर्ण है या फिर नहीं है। इसके साथ-साथ यह भी आवश्यक है कि हम अपने पूर्वजों और उनकी ऐतिहासिक प्रतीकों का सम्मान करें।

उपनिवेशवादी शोषण, रंगभेद, टकराव, हिंसा तथा युद्ध की विभीषिका झेल रहे बीसवीं शताब्दी के विश्व को महात्मा गाँधी ने अहिंसा और शांति का पाठ पढ़ाया। विश्व के सबसे बड़े और शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्यवाद से संघर्ष करके उन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप को विदेशी शासन से स्वतंत्रता दिलाई। बिना किसी शस्त्र और युद्ध के लड़ा गया यह स्वतंत्रता संग्राम मानवता के इतिहास में एक अनूठा कदम रहा। गाँधीवादी संघर्ष के साथ, असहयोग, अहिंसा, अनशन और आत्मत्याग थे। जिनका तोड़ ब्रिटिश शासकों के पास मौजूद नहीं था।

महात्मा गाँधी ने अपनी अनोखी संचार शैली के माध्यम से भारत की सुप्त पड़ी आत्मा को जगाया। उन्होंने धर्म को सही अर्थों में परिभाषित किया और उसे जन नेतृत्व से जोड़कर राजनीतिक जीवन को एक सुचिता और नई प्रेरणा दी। गाँधीवादी प्रभाव और संस्कृति के कारण ही भारत एक ऐसा देश बना जहां सामंतवाद, जातिगत भेदभाव और आर्थिक असमानता दूर करने की प्रक्रिया हिंसा शून्य तरीके से करने का आधार रखा गया।

महात्मा गाँधी ने समाज के बड़े और समृद्ध वर्ग को गरीब, लाचार और वंचित व शोषित वर्गों के प्रति संवेदनशील बनाकर विश्व के सबसे बड़े सामाजिक आंदोलन का सूत्रपात किया। खादी और ग्रामोद्योग को की बात कर उन्होंने विपन्न भारत के आर्थिक पुनरुत्थान की आधारशिला रखी।

आज हम गाँधीवादी आदर्शों को बुलाकर जिस निरंकुश पूंजीवादी विकास और उपभोक्तावादी संस्कृति के शिकार हैं वही हमारी तमाम समस्याओं का मूल कारण है। इसने लोभ, प्रतिस्पर्धा, आत्म तुष्टिकरण, आर्थिक प्रदर्शन तथा अहम की उन तमाम छोटी-मोटी प्रवृत्तियों को जन्म दिया जो कि हमारे भारतीय समाज की वास्तविक संस्कृति नहीं है।

जातिगत तथा धर्मगत संघर्ष, अनैतिकता, टकराव और हिंसा का मुख्य कारण यह वैचारिक व सांस्कृतिक भटकाव ही है। जो कि हमें अनिश्चितता और अंधकार की राह में ले जा रहा है। यदि हमारे समाज और देश को शांतिपूर्ण सर्वांगीण विकास के पथ पर निरंतर अग्रसर होना है तो महात्मा गाँधी द्वारा दिखाई गए रास्ते पर चलना होगा। गाँधीवादी विचारधारा पर चलना आज समय की मांग है और यह अत्यंत आवश्यक भी है। यह बात आज विश्व के तमाम राष्ट्र भी समझ रहे हैं।

अहिंसा और शांति के प्रणेता रहे युगपुरुष महात्मा गाँधी की 150वीं जयंती पर विश्व के तमाम देश उनको याद कर रहे हैं। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि आज के समय में गाँधी और गाँधीवादी विचारधारा की कितनी सार्थकता है। लेकिन यह बड़े दुख की बात है कि आज गाँधीवादी विचारधारा के महत्व को नकारा जा रहा हैं। राष्ट्रपिता गाँधी की इस जयंती पर हमें यह आशा करनी चाहिए कि उनके समर्पण भाव, शांतिप्रिय, सौहार्द और आत्मत्याग जैसे आदर्शों को खुद में आत्मसात करेंगे। इसके साथ ही हम उनके आदर्शों पर चलते हुए भारत को विश्व में अग्रणी राष्ट्र बनाने की दिशा में अग्रसर होंगे। #

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