मीडिया मंथन : बाबूराव विष्णु पराड़कर जी पत्रकारिता के आदर्श स्तम्भ

राजनैतिक मुद्दों पर बहुत ही सगजता से सरल भाषा में लेख लिखने में माहिर पत्रकारों की फेहरिस्त में पराड़कर जी का नाम सबसे उपर आता है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हिंदी पत्रकारिता को जनजागरण के रुप में इस्तेमाल करने वाले पत्रकार के रुप में भी पराड़कर जी का नाम शुमार हैं। सम्पादकाचार्य पण्डित बाबूराव विष्णु पराड़कर भारत, भारतीय और भारतीयता के  उन्नायक थे। राष्ट्र की मुक्ति और समाज की सर्वांगीण उन्नति के लिए इन्होंने 50 वर्षो तक प्रचंड साधना की। राष्ट्रीय जागरण, राष्ट्रभाषा की गौरव वृद्धि के लिए पराड़कर जी सतत स्मरणीय है।

पराड़कर जी का जन्म काशी के एक मराठा परिवार ने हुआ था। इनके पूर्वज पूना के निवासी थे। इनके पिता विष्णुराव अपनी बाल्यावस्थ्या में ही काशी चले आए। वे बिहार के विभिन्न विद्यालयों में अध्यापक थे। यघपि पराड़कर जी ने अक्षर-ज्ञान काशी में प्राप्त किया किन्तु छपरा और भागलपुर में उन्हें प्रारम्भिक शिक्षा मिली। वे मात्र 15 के ही थे की पिताजी का देहावसान हो गया। पढाई छोड़कर उन्हें परिवार के भरण-पोषण का मार्ग ढूँढना पढ़ा।


कलकत्ता से प्रकाशित “हिंदी बंगवासी” के लिए एक उपसम्पादक का विज्ञापन पराड़कर जी ने कही देख लिया। इनके प्रार्थना पत्र को देखकर सम्पादक हरिकृष्ण जौहर ने इन्हे कलकत्ता बुला लिया। कलकत्ता में पराड़कर जी के मामा सखाराम गणेश देउस्कर पहले ही से “हितवती” के प्रधान सम्पादक पद पर कार्यरत थे। मामा के सानिध्य में इनके व्यक्तित्व का विकास हुआ। हिंदी, अंग्रेजी और बंगला भाषा में निष्णात होने का स्वर्णिम अवसर पराड़कर जी को कलकत्ता में ही प्राप्त हुआ। 

स्वाध्याय की आदत के चलते इनका बौद्धिक विकास हुआ तथा पत्रकरोचित लेखन में इन्हे दक्षता प्राप्त हुई। “हिंदी बंगवासी” के संचालक प्रतिक्रियावादी नीतिवाले थे परिणामस्वरुप पराड़कर जी से मतभेद हो गया और उन्हें पत्र से हटना पड़ा। इसके पश्चात पराड़कर जी “हितवार्ता” के हिंदी संस्करण के संपादन में जुट गए। पत्रकारिता का दायित्व निभाने के साथ वे नेशनल कालेज ने हिंदी और मराठी के अध्यापन का कार्य भी  करने लगे। यह कॉलेज क्रन्तिकारी युवकों का केंद्र था जिसके प्राचार्य योगी अरविन्द घोष थे। क्रांतिधर्मिता पराड़कर जी के रग-रग में समां गई। मामा देउस्कर की बंगला पुस्तक “देशेर कथा” के अनुवाद के पराड़कर की मुख्य भूमिका थी। “देश की बात” के प्रकाशन होते ही ग्रंथ जब्त हो गया जबकि मूल पुस्तक की और किसी की दृष्टि नहीं गयी थी।

क्रन्तिकारी युवको से तादातम्य होने पर पराड़कर जी के विचार प्रखर होते गए जिसका प्रकाशन “भारत मित्र” में होता था। वर्ष 1916 में क्रन्तिकारी पराड़कर गिरफ्तार हुए। राजबंदी के रूप में लगभग साढ़े तीन वर्षो तक वे बंगाल के विविध जेलो में थे। वे अकसर कहा करते थे कि “मै गुप्त समितियों मै कार्य करने के लिए ही कलकत्ता गया था, पत्रकार बनने नहीं। पत्रकरिता तो मेरे गले पढ़ गयी।”

वर्ष 1920 में जेल से मुक्त होने पर पराड़कर जी काशी लौट आए तथा ज्ञानमंडल से सम्बद्ध हो गए। राष्ट्ररत्न शिवप्रसाद गुप्त जब विश्व-भ्रमण कर काशी लौटे तो उनके मन में हिंदी में एक सर्वांग सुन्दर दैनिक निकलने कि बात आयी। उन्होंने पराड़कर जी को लोकमान्य तिलक के पुणे भेजा ताकि पत्र के लिए निर्देश प्राप्त हो सके। इस सन्दर्भ में पराड़कर जी ने  “आज” के पहले अंक में लिखा “यहाँ हम इतना ही कह देना आवश्यक समझते है कि “आज” कि जो नीति निर्धारित कि गयी है, उससे स्वर्गवासी लोकमान्य कि सहानभूति थी। लोकमान्य के दर्शन करने तथा पत्र की नीति के सम्बन्ध में आपके उद्देश्य लेने के लिए इसका लेखक गत सौर ज्येष्ठ मास के अन्त में पुणे गया था। उस समय “आज” की नीति के सम्बन्ध में आपसे बहुत कुछ बातें हुई थी तथा आपने अनेक बहुमूल्य उपदेश भी दिए थे। पर सबसे प्रधान उपदेश यही कि स्वराज्य प्राप्त करने का प्रयत्न करो, लोगो को उनके स्वाभाविक अधिकार बता दो तथा धर्म का कर्तव्य पालन करते हुए भी यदि विघ्न उपस्थित हो तो उसकी परवाह मत करो और ईश्वर के न्याय पर विश्वास रखो। यह उपदेश पालन करना हमारे जीवन का उद्देश्य होगा।” पराड़कर जी ने अपनी डायरी में लिखा “ऐशी ही परतन्त्रता” विषनदि, मांगल्याविंध्यवंसिनी।” 

मराठी में लिखित उनकी निम्नलिखित पंक्तिया स्वतंत्रता कि महता को प्रतिपादित करती है “मृत जे ज्यानां जिवन्त करिते सुधा, बोलती सारे। मृत राष्ट्राणां जीवतं, करिते स्वतंत्रता अनुभव रे। मृनुनी हयन्तो-स्वतंत्रता ही सुधाची भुलोकिं ची, अथवा जाण सुधा असैती स्वतंत्रता स्वर्गीची।।” जिसका मतलब यह है कि मृत व्यक्ति को जीवित करने की शक्ति जिसमें है, उसे लोग अमृत कहते है। राष्ट्र को जीवित करने की शक्ति जिसमें है, उसे स्वतंत्रता कहते है। स्वतंत्रता पृथ्वी ही नहीं स्वर्ग की भी सुधा है।

इसी स्वतंत्रता की ध्वनि कप अनुग्रहित करने के लिए पराड़कर जी ने शब्दों में सामर्थ्य भर दिया ताकि बहरे फिरंगियों तक अपनी बातें पहुँचायी जा सके। लगता है निम्नलिखित पंक्तियों को उन्होंने आजादी के पूर्व अच्छी तरह समझ लिया था- “शब्दों में सामर्थ्य का भरें नया अंदाज। बहरे कानों को हुए अब अपनी आवाज।”

5 सितम्बर, 1920 को “आज” की सम्पादकीय टिप्पणी में उन्होंने लिखा था- “हमारा उद्देश्य अपनी देश के लिए सर्व प्रकार से स्वातंत्रय उपार्जन है। हम हर बात में स्वतंत्र होना चाहते है। हमारा लक्ष्य है की हम अपने देश के गौरव को बढ़ावे, अपने देशवासियो में स्वाभिमान-संचार करें। उनको ऐसा बनावे की भारतीय होने का उन्हें अभिमान हो, संकोच न हो यह अभिमान स्वतंत्रता देवी की उपासना करने से मिलता है।”

यही कारण था की उनकी सम्पादकीय पंक्तिया मंत्रवत सिद्ध हुई। क्रन्तिकारी पराड़कर जी ने भारत की स्वाधीनता हेतु सर्वस्व अर्पित करने का संदेश नवयुवको को दिया। सन 1920 से 1942 तक काशी के क्रन्तिकारी आंदोलन के अग्रणी नेता वे ही थे। काशी में क्रन्तिकारी दल की स्थापना के मूल श्री पराड़कर जी ही थे। आचार्य नरेन्द्रदेव के अनुसार वे प्रखर उग्र राष्ट्रवादी थे- “पराड़कर जी उग्र राष्ट्रवादी थे और बंगाल के विप्लववादियों से उनका घनिष्ट सम्बन्ध था। काशी आने पर भी उनका यह पुराना सम्बन्ध नहीं टुटा और समय-समय पर क्रांतिकारी उनसे सलाह लिया करते थे।”

“रणभेरी” के सम्पादन द्वारा पराड़कर जी ने राष्ट्रीय आंदोलन को एक अप्रतिम शक्ति प्रेरणा और प्रोत्साहन दिया। महर्षि अरविन्द घोष, रासबिहारी बोस, शिवराम राजगुरु सदृश क्रांतिकारियों के सानिध्य में श्री पराड़कर जी ने कलम के साथ-साथ तलवार की पूजा की। उनकी मनोभावना जानने के लिए 25 मार्च 1931 को प्रकाशित “आज” के अग्रलेख की निम्नलिखित पंक्तिया प्रस्तुत है- “सरदार भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव सोमवार को संध्या समय फाँसी पर लटका दिये गए। साधारणत फाँसी सवेरे दी जाती है। इस अवसर पर किसी कारण से शाम को दी गई। सारे देश ने दया के लिए प्रार्थना की। लाहौर के कानुनपेशा लोगो ने अन्त तक उन्हें बचाने का यत्न किया, पर सब व्यर्थ हुआ, इस पर अधिक कहना-सुनना व्यर्थ है। ह्रदय का रक्त मुँह में लाकर इतना अवश्य कहेंगे की यह प्रश्न तीन आदमियों के प्राणों का ही नहीं था, प्रश्न था राष्ट्र की प्रार्थना का, वह प्रार्थना अस्वीकृत हो गयी। भारतीय आकाश में प्रेम का जो सूर्योदय हुआ था, वह फिर से मेघाछन्न  हो गया। हम तो इतना ही कहेंगे की ब्रिटिश शासकों का हृदय बदलने का जो प्रमाण हम ढूंढ रहे थे, वह हमें नहीं मिला। अब भी देश में नौकरशाही प्रथा प्रबल है।”

वर्ष 1930 में सरकारी आर्डिनेंस के विरुद्ध “आज” का प्रकाशन बंद हो गया। राष्ट्रीय आंदोलन से सुपरिचित कराने के निमित पराड़कर जी ने “आज के समाचार” बुलेटिन निकाला जिसके बंद होने पर “रणभेरी” नाम की भूमिगत पत्रिका निकाली गई। पत्र का लक्ष्य था- “रणभेरी बज उठी बीरवर पहनो केसरिया बाना”

“रणभेरी” का प्रकाशन कर पराड़कर जी ने क्रांतिकारी पत्रकारिता का प्रयोग कर स्वतंत्रता संग्राम को उद्देलित किया। 16 अगस्त 1930 की “रणभेरी” में पराड़कर जी ने लिखा- “रणभेरी उसके (पुलिस के) सर पर बजेगी और तब तक बजती रहेगी जब तक काले कानून रहेंगें और काशी में देशभक्ति रहेगी। डरा-धमका कर लोगो को देशद्रोही बनाने का जमाना गया। “वर्ष 1925 में वृन्दावन में हिंदी साहित्य सम्मलेन हुआ। 

इसी अवसर पर हिंदी सम्पादक सम्मलेन का भी आयोजन हुआ। इस अवसर पर संपादकाचार्य पराड़कर जी ने पत्रकारिता के सन्दर्भ में हो अभिमत प्रकट किया वह आह भी उपयोगी और पत्रकारिता-जगत हेतु माननीय है “हमारे समाचारपत्रों की वर्तमान अवस्था यघपि संतोषजनक नहीं है पर भविष्य उज्जवल है, पर यही बात सम्पादको के भविष्य के सम्बन्ध में नहीं कही जा सकती, इसका कारण मै आगे चलकर बताऊँगा। पहले पत्रों का प्रचार अधिक न होने के कारणों पर विचार करना आवश्यक है। मेरी अल्पमति के अनुसार इसके मुख्य तीन कारण हैं-(1) पत्रों का समाज के प्रतिबिम्ब न होना (2) धनाभाव और (3)जनता में, विशेषकर हिंदी भाषियों में साक्षरता का अल्प प्रचार। पत्रों का समाज के प्रकृत जीवन से सम्बद्ध ना होने को मै सबसे बड़ा कारण इसलिए समझता हूँ कि इसके निराकरण का उपाय बहुत-कुछ हमारे ही हाथ में है पर हम उधर ध्यान नहीं देते। 

समाचारपत्र, समाज का प्रतिबिम्ब भी होना चाहिए और उसे अपने पाठको के सामने उच्च आदर्श भी रखने चाहिए। समाज कि प्रकृत अवस्था का वर्णन, गुण-दोष विवेचन, सुधार-मार्ग प्रदर्शन और मनोरंजन, यह सब समाचारपत्रों का कर्तव्य है। आजकल हमारे अच्छे सम्पादक आदर्श की ओर ही अधिक ध्यान देते है, अपने पत्रों को समाज का प्रतिबिम्ब बनाने कि ओर बिल्कुल ध्यान नहीं देते। विदेशी और अर्द्ध-विदेशी समाचार समितियाँ जो समाचार देती है, वे भी हमारी टीका-टिप्पणी के विषय होते है। समाचार संग्रह के हमारे स्वतंत्र साधन नहीं है। जो समाचार उपयुक्त समाचार समितियों से मिलते है, प्राय: वह लड़ाई-झगड़ो के और ऊपरी आंदोलनों के ही होते है और प्राय: नौकरशाही रंग में रेंज होते है। हम और गहरे जाने का प्रयत्न नहीं करते। हमारे पाठक किन-किन श्रेणियों के है, उनका रहन-सहन कैसा है, उनकी जीविका के साधन क्या है, उनको जीवन-संग्राम में किन-किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, उनका आमोद-प्रमोद क्या है, उनकी रूचि कैसी है, वह क्या सोचते है और क्या चाहते है इन बातों का हम सम्पादको को बिलकुल पता नहीं रहता। 

यदि मेरे किसी आदरणीय भाई को इन बातों का ज्ञान हो भी तो उसे कार्य में परिणित होते देखने का सौभाग्य मुझे प्राप्त नहीं हुआ है। इन बातों का हम पता लगाया करें। लोगो को वही समाचार दे जो वह चाहते है और उनके जीवन संग्राम में सहायक बनने का प्रयत्न करें तो हमारे पत्रों का प्रचार देखते-देखते बढ़ जाएगा। समाचारपत्र पढ़ना लोगो के डेली लाइफ का अंग बन जायेगा। यह अभाव केवल हिंदी पत्रों में नहीं है, इंडो-इंग्लिश, बंगला, मराठी, गुजरती, उर्दू आदि जिन-जिन भाषाओ के पत्र देखने का मुझे अवसर मिला है, सबमें यही दिखाई देता है।”

“संसार” और पराड़कर जी सन 1943 से 14 अगस्त, 1947 तक पराड़कर जी 'संसार' के प्रधान सम्पादक थे। “संसार” के अग्रलेखो ने पाठको में नवीन जागृति पैदा की। स्वतंत्रता, आंदोलन में मर-मिट जाने की भावना भरने में 'संसार' अग्रणी पत्र था-  “किसी के कान गढ़ता, चलो दिल्ली, चलो दिल्ली। सुनाई अब यही पड़ता, चलो दिल्ली, चलो दिल्ली।”

ज्वालामुखी के मुख पर दलन, दासता, दोहन और दकियानूसी जर्जर अवस्थाओं के विरुद्ध विद्रोह की ध्वजा उड़ाना तो युग-युग में मानव-जाति की विशेषता रही है। दंड और दमन का समय लड़ चुका। पत्रकार के रूप में पराड़कर जी की दूरदर्शिता को स्पष्ट करने के निमित 25 मई 1944 को “संसार” में प्रकाशित उनकी पंक्तियां दृष्टद्रव्य है- “फिर भी हम समझते है की भारत में अरुणोदय होने जा रहा है। इसका कारण यह है की समस्या जब अत्यंत जटिल और असह्य हो जाती है तब उसका निपटारा हो ही जाता है। रोग आप अपनी दवा बन जाता है। हमारा विश्वास है की रोग से भारत मुक्ति पा जाएगा, भय का स्थान आत्म-विश्वास ग्रहण करेगा-जगत में भारत अपना पद पा जाएगा।”

15 अगस्त 1947 के आज के लेख में पराड़कर जी ने लिखा स्वतंत्र होने के साथ-साथ हमारे कंधो पर जितना भरी उत्तरदायित्व आ गया है उसे हमें न भूलना चाहिए। पत्रकारिता और पराड़कर जी की उक्तियाँ -“अपने पत्र की भाषा और अंग्रेजी दोनों का अच्छा ज्ञाता हुए बिना भारतीय भाषा के पत्रों का उपसम्पादक तो क्या संवाददाता होना भी कठिन है। पत्र बेचने के लाभ से अश्लील समाचारो को महत्व देकर तथा दुराचरण मूलक अपराधों का चित्ताकर्षक वर्णन कर हम परमात्मा की दृष्टि में अपराधियों से भी बड़े अपराधी ठहर रहे है, इस बात को कभी भी न भूलना चाहिए।”

वैसे सामान्य तौर पर देखा जाय तो सम्पादक में साहित्य और भाषा ज्ञान के अतिरिक्त भारत के इतिहास का सूक्ष्म और संसार के इतिहास का साधारण ज्ञान तथा समाज शास्त्र, राजनीती शास्त्र और अंतर्राष्ट्रीय विधानों का साधारण ज्ञान होना आवश्यक है। समाज के जीवन में जिन प्रश्नो पर उचित निर्णय की आवश्यकता होती है और जिन निर्णयों पर समाज का जीवन अन्त में निर्भर रहता है, उनके बारे में जनता को योग्य जानकारी कराना, उनके सम्बन्ध में जनमत का निर्माण और नेतृत्व करना, उस मत को प्रकट करना उससे अधिक से अधिक लाभ जनता को पहुँचाना एक आदर्श पत्रकार का कर्तव्य है। 

आजादी के बाद पराड़कर जी ने पत्रकारिता को नए भारत के निर्माण के लिए युवाओं को प्रेरित करने का जरिया बनाया। सटीक व छोटे वाक्यों के द्वारा बढ़ी खूबसूरती से जनता तक अपनी बात पहुंचाने में बाबूरावजी को महारत हासिल थी। अपनी इसी महारत के चलते पराड़कर जी ने “आज”, “भारतमित्र” और “‘संसार” नामक समाचारपत्रों को एक नई बुलंदियों तक पहुंचाया। वाराणसी में 12 जनवरी 1955 को पराड़कर जी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। वाराणसी में 12 जनवरी 1955 को हिंदी पत्रकारिता में मील का पत्थर कहे जाने वाले बाबूराव विष्णु पराड़कर जी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। #

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