आर्थिक जगत : अर्थ नीति में सुधार करने की है आवश्यकता

 


र्ष 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार जब सत्ता में आई। भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार 1.5 मिलियन ट्रिलियन डॉलर था। जो कि आज लगभग 3 ट्रिलियन डॉलर के आसपास हो गया है। वर्ष 2018 के मध्य तक विकास दर 8 प्रतिशत के ऊपर था और भारत विश्व की सबसे तेजी से उभरने वाली अर्थव्यवस्था बन गई थी। नवंबर 2016 में विमुद्रीकरण और जुलाई 2017 में जीएसटी के निर्णय के उद्देश्य अच्छे थे किंतु अर्थव्यवस्था पर उनका प्रभाव कुछ अच्छा नहीं रहा। विश्व बाजार में मंदी की स्थिति के चलते यह कदम महंगे साबित हुए। पिछली छह तिमाहियों से अर्थव्यवस्था नीचे गिरती जा रही है। विकास तो हो रहा है किंतु बहुत धीमी गति से हो रहा है। जीडीपी विकास दर 4.5 प्रतिशत पर आ गया है जो कि अर्थव्यवस्था के लिए काफी चिंता का विषय है।

कारखानों के उत्पादन में कमी आई है और निर्यात लगातार घट रहा है जिससे बेरोजगारी में इजाफा हो रहा है। आवश्यक वस्तुओं की कीमत में वृद्धि हुई है और लोगों की आय में कोई इजाफा नहीं हो रहा है जिसके चलते मांग में कमी आई है। लघु व मझौले किसान, उत्पादक, व्यापारी और मजदूर सभी आर्थिक मंदी से प्रभावित हुए हैं।

सरकार की कुछ जनकल्याणकारी योजनाएं जैसे जनधन, उज्जवला, स्वच्छता अभियान आदि सराहनीय रही हैं किंतु बड़ी संख्या में योजनाओं क्रियान्वन अपेक्षा से कम रहा है। भ्रष्टाचार कम हुआ है और प्रशासन की कार्यशैली में भी कुछ चुश्ती आई है। व्यापार करने के सहूलियतों के मापदंड पर भारत कुछ आगे आया है किंतु अभी भी नौकरशाही हावी ही है। प्रशासन में जन भागीदारी बढ़ाने की आवश्यकता है।

वस्तुओं की मांग में आई कमी के कारण देश के कारखाने अपनी पूरी क्षमता का बेहतर उपयोग नहीं कर पा रहे हैं जिससे उत्पादन में कमी आई है। पिछले वर्ष अक्टूबर में कारखानों की उत्पादन दर में 8.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी लेकिन वर्ष 2019 की अक्टूबर में यह 3.8 प्रतिशत पर आ गई है। ऊर्जा, माइनिंग, कोयला, कच्चा तेल तथा बिजली उत्पादन जैसे पूंजीगत उद्योगों में उत्पादन की कमी होना स्पष्ट रुप से कारखानों में निवेश की कमी का द्योतक है।

मंदी के सबसे अधिक प्रभाव ऑटोमोबाइल उद्योग पर पड़ा है। यह भारत का चौथा सबसे बड़ा उद्योग है जो कि मांग की कमी के कारण तेजी से नीचे आया है। पिछले वर्ष नवंबर माह में कारों की बिक्री की तुलना में इस वर्ष नवंबर में 8 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। ऑटोमोबाइल उद्योग संगठित क्षेत्र में रोजगार देने वाला बहुत बड़ा उद्योग है, इससे संबंधित कल-कारखाने बड़ी संख्या में रोजगार उत्पन्न करते हैं। मरम्मत एवं रखरखाव की सेवा में भी बड़ी संख्या में लोग लगे हुए हैं। देश में बेरोजगारी की आज जो स्थिति है उसका एक बड़ा कारण ऑटोमोबाइल उद्योग में गिरावट है।

रोजगार सृजन का एक और बहुत बड़ा स्त्रोत भवन निर्माण (रियलस्टेट सेक्टर) भी संकट के दौर से गुजर रहा है। रियल स्टेट सेक्टर क्षेत्र की 12 बड़ी कंपनियां बैंक्रप्टी कानून के दायरे में आ गई हैं। इन कंपनियों ने खरीददारों से पैसे एडवांस लेकर समय पर उनको फ्लैट नहीं दिए गए और पूंजी का दुरुपयोग किया गया। यानि कि लोगों की गाढ़ी कमाई पर डाका डाला गया। उद्योग-कारखानों में लगातार हो रही उत्पादन में कमी, कृषि सेक्टर में परिवारों के लिए पर्याप्त भूमि का अभाव, बाजार में मुद्रा की कमी और तेजी से बढ़ती हुई आबादी देश में बढ़ती बेरोजगारी के प्रमुख कारण हैं।

पिछले कई वर्षों से बेरोजगारी की दर 3.5 प्रतिशत के आसपास थी। वर्ष 2016-17 में यह दर 6 प्रतिशत पर आ गई और आज 9 प्रतिशत के पास पहुंच चुकी है। आबादी की दृष्टि से भारत नौजवानों का देश है जहां रोजगार सृजन तेजी से ना होने के कारण बेरोजगार लोगों का आक्रोश दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है।

विश्वव्यापी मंदी का प्रभाव भारत के विदेश व्यापार पर भी पड़ा है। अमेरिका और चीन के बीच चल रहे व्यापार युद्ध (ट्रेड वॉर) ने विश्व के अधिकांश देशों को प्रभावित किया है। पिछले 4 महीनों में मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट में भारी कमी दर्ज की गई है। निर्यात की जाने वाली 30 मुख्य वस्तुओं में 17 की मांग में कमी आई है। इसी बीच आयात में भी कमी हुई जिससे देश का व्यापार घाटा कम हुआ। कुछ वस्तुओं के निर्यात में वृद्धि भी हुई है, जिनमें प्रमुख हैं- इलेक्ट्रॉनिक्स सामान, दवाएं, इंजीनियरिंग मटेरियल्स एवं मैरिन प्रोडक्टस।

खेती की पैदावार में इस वर्ष कुछ कमी की आशंका है। मानसून देर से आया जिससे बुवाई भी देर से हुई। देश के 12 राज्यों में बाढ़ का तांडव बड़े पैमाने पर खड़ी फसलों को नष्ट कर गया। करोड़ों की संख्या में किसान प्रभावित हुए। वर्ष 2019-20 में खरीफ की फसल में 4.6 प्रतिशत की गिरावट का अनुमान है। उत्पादन में कमी खाद्य पदार्थों की कीमतों को बढ़ा रही है। इससे जहां आम उपभोक्ता परेशानी का अनुभव कर रहे हैं वहीं किसानों को उनके उत्पाद की बढ़ने से लाभ हो रहा है।  क्रिसिल की रेटिंग के आधार पर इस वर्ष किसानों को मुनाफे में 7-9 प्रतिशत की वृद्धि संभव है। बाजार में प्याज, मूंगफली, सोयाबीन और दालों की कीमतों में हुई वृद्धि एवं सरकार द्वारा खरीदी जाने वाली कृषि उत्पादों की कीमतों में वृद्धि का भी लाभ किसानों को होने की संभावना है।

कीमतों में उछाल आम आदमी की जेब पर भारी पड़ रहा है। उपभोक्ता कीमतों का सूचकांक नवंबर 2019 में 5.54 प्रतिशत पर आ गया, जो कि पिछले तीन वर्षों का सबसे ज्यादा है। खाद्य पदार्थों की कीमतों का सूचकांक नवंबर 2019 में 10 प्रतिशत पर था। हालांकि अब यह नीचे आ रहा है। धान के उत्पादन में इस वर्ष 12 प्रतिशत एवं तिलहन के उत्पादन में 4.5 प्रतिशत की कमी का अनुमान है। जोकि इनकी कीमतों को उपर रखेगा। लघु किसानों की आर्थिक स्थिति अभी भी दयनीय है। कर्ज माफी के वायदे अधिकांश राज्यों में कागज पर ही हैं।

विदेशी मुद्रा (एफडीआई) का निवेश पिछले पांच वर्षों में तेजी से बढ़ा है। विदेशी मुद्रा का भंडार जो वर्ष 2014 में 300 बिलियन डॉलर के लगभग था अब 450 बिलियन डॉलर के उपर है। भारत उन दस बड़े देशों में है जिन्हें विदेशी निवेशकों की पसंद की सूची में रखा जा रहा है। पिछले पांच वर्षों में भारत में जितना विदेशी निवेश (एफडीआई) हुआ है इसके पहले 20 वर्षों में कभी नहीं हुआ। संस्थागत विदेशी निवेश भारत और विश्व की अर्थव्यवस्था और शेयर बाजारों की हलचल पर निर्भर रहता है। कभी घटता है, तो कभी बढ़ता है। हाल के कुछ दिनों में चीन और अमेरिका के ट्रेड वॉर घटने के संकेत ब्रेक्जिट की अनिश्चितता खत्म होने और अन्य कारणों से शेयर बाजारों में भारी उछाल आया। भारत में भी शेयर सूचकांक अब तक के सबसे रिकॉर्ड तोड़ गए। ऐसी स्थिति में संस्थागत निवेश भारत में भी बढ़ा है जो कि एक अच्छा संकेत है।

जीएसटी लागू करने के बाद सरकार को टैक्स की जितनी उम्मीद थी इतनी उगाही नहीं हो हुई। प्रतिमाह कम से कम एक लाख करोड़ का लक्ष्य है। नंबर 2019 में कुल उगाही 1,03,492 करोड़ रुपए की हुई। इसके पूर्व तीन महीने में लगातार जीएसटी की उगाही एक लाख करोड़ से कम रही है। इसका मुख्य कारण उत्पादन में गिरावट और मांग की कमी थी।

अक्टूबर त्यौहारों का महीना होने के कारण मांग वृद्धि का कारण बना जो नवंबर में टैक्स उगाही लक्ष्य से उपर हो आया। वर्ष 2019-20 के पूरे वित्त वर्ष में आयकर उगाही का लक्ष्य 13.5 लाख करोड़ का था और अगले चार महीने में जीएसटी का 4.5 लाख करोड का रखा गया है। जीएसटी के रेट से व्यापारियों को उतनी परेशानी नहीं है जितनी उसके रिटर्न भरने की कठिनाई और रिफंड में देरी से है। रिटर्न भरने के फॉर्म और प्रोविजन के सरलीकरण की व्यापारी शुरु से ही मांग कर रहे हैं। जो कि नौकरशाही की सलाह के कारण सरकार नहीं कर पायी। जिसका परिणाम टैक्स उगाही की कमी के रुप में देखा जा सकता है। लघु और मध्यम व्यापारियों के कारोबार एवं इस क्षेत्र में रोजगार पर इसका प्रतिकूल असर पड़ा है।

अर्थव्यवस्था को मंदी से उभारने के लिए सरकार ने जो कदम उठाएं हैं वह काफी नहीं लगते। लोगों की क्रय शक्ति बढ़ाए बगैर मांग में वृद्धि की कल्पना करना व्यर्थ है। लोग अधिक से अधिक खरीददारी करें इसको प्रोत्साहन देने के लिए सरकार ने लोन मेलों का वर्ष 2019 के अक्टूबर व नवंबर महीने में आयोजन किया। वित्त मंत्रालय के अनुसार इन दो महीनों में सरकारी बैंकों ने कुछ 4.91 लाख करोड़ के लोन छोटे-बड़े व्यापारियों, नॉन बैंक लेंडर्स और किसानों को दिए। कार्पोरेट टैक्स की दर सितंबर महीने से 30 प्रतिशत की जगह 22 प्रतिशत कर दी गई  एवं नई मैन्यूफैक्चरिंग कंपनियों के लिए 25 प्रतिशत से 15 प्रतिशत कर दी गई। जो कि एक बड़ी छूट मानी जा रही है। कंपनियों ने इसका स्वागत किया है। इसका लाभ जनता तक तब पहुंचेगा जब कंपनियां वस्तुओं एवं सोवाओं की कीमत घटाएं, न कि इससे बैलेंस सीट सजाएं।

अदेय ऋण (एनपीए) की मार ग्रसित बैंकों को सरकार ने पिछले बजट में भारी रकम उनकी पूंजी वृद्धि के लिए दिया। जिसका बैंको को लाभ हुआ। लेकिन बैंको की कार्यक्षमता और कुशलता पर प्रश्न चिन्ह उठते रहे हैं। हाल ही में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया  पर एनपीए के बार में अंडर रिपोर्टिंग का आरोप रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने लगाया। नॉन-बैंकिंग फाइनेसिंग कंपनियों और सहकारी बैंकों में घोटालों के कारण भी बैंकिंग व्यवस्था पर उंगली उठाई जा रही है। चीन के सस्ते दामों वाले घटिया सामान के ढेर से भारत पटा पड़ा है, जिससे छोटे व मध्यम उद्योगों को धंधा चौपट हो रहा है। इसके लिए सरकार कोई कारगर कदम नहीं उठा रही है। छोटे किसीनों, उद्यमियों एवं व्यापारियों की कठिनाइंयों को दूर करने के निरंतर प्रयास में तेजी लाने की आवश्यकता है। #

 

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