आर्थिक जगत : आखिर आर्थिक संकट का मूल कारण क्या हैॽ


वैश्विक पैमाने पर कल तक काफी तेजी से उभरती हुई हमारी भारतीय अर्थव्यवस्था आज आर्थिक संकट के दौर से गुजर रही है। जो कि एक गहरी चिंता का विषय बनता जा रहा है। काफी समय तक इस वास्तविकता से इंकार करने के बाद सत्तारूढ़ भाजपा सरकार और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अंधभक्त भी इस बात को स्वीकार करने लगे है कि आज हमारे देश में आर्थिक संकट गहरा है।

वित्तमंत्री निर्मला सीतारमन की तमाम लीपा-पोती के बावजूद भी सरकारी आंकड़े इस सत्य को छुपाने में असफल रहे हैं कि विकास दर, व्यापार, विनिमय दर, उत्पादन, आयात-निर्यात तथा रोजगार जैसे आर्थिक प्रतिमानों में गिरावट आई है। इससे भी बड़ी बात यह है कि इस संकट से उभरने के लिए कहीं कोई संभावना भी नजर नहीं आ रही है।

ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि आखिरकार इस आर्थिक संकट का कारण क्या हैॽ साथ ही इस बात पर विचार करने की आवश्यकता है कि पिछले वर्षों तक लगातार तेजी से आगे बढ़ती हमारी अर्थव्यवस्था यकायक इतनी खराब स्थिति में कैसे आ गईॽ आज ऐसे कई गंभीर सवाल हमारे सामने खड़े हैं जिनके जबाव तलाशने होंगे।

हमारे आर्थिक संकट का कारण ना तो पूंजीवाद है और ना ही समाजवाद है। जहां समाजवाद ने इंदिरा गाँधी युग में ब्रिटिश उपनिवेशवाद के दौर में शोषित, जर्जर और मृत प्राय: पड़ी अर्थव्यवस्था को संजीवनी देकर पुनर्जीवित किया और उसे समग्र विकास का मार्ग दिखाया। वहीं वर्ष 1980 के दशक में प्रारम्भ हुई उदारवादी व्यवस्था तथा भू-मंडलीकरण ने भारतीय अर्थव्यवस्था को विकास तथा उन्नति के नए आयाम दिए।

वर्ष 2014 में यह विरासत भाजपा के भाग्यशाली प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को प्राप्त हुई। इक्कीसवी शताब्दी के द्वितीय दशक में भारत विश्व की बड़ी और तेजी से उभरती आर्थिक शक्ति के रुप में खुद को स्थापित करने में सक्षम हुआ।

वर्तमान आर्थिक संकट का मूल कारण वह विशुद्ध राष्ट्रवाद है, जिसके मार्ग पर मोदी की भाजपा सरकार देश को ले जा रही है। इसी अति राष्ट्रवादी विचारधारा के कारण ही वर्ष 1930 में यूरोप में आर्थिक संकट का दौर आया था। तब यह बात एकदम स्पष्ट हो गई थी कि राष्ट्रवादी विचारधारा विकास विरोधी है तथा इसके द्वारा किसी भी प्रकार का आर्थिक विकास संभव नहीं है।

राष्ट्रवादी अर्थव्यवस्था का वैचारिक आधार लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए नहीं होता है। बल्कि वह राष्ट्र को मजबूत करने और राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने के लिए होता है। इस तरह से हम अत्याधिक शक्तिशाली राष्ट्रीय मॉडल बनाने के लिए तैयार हो जाते हैं। हाँ, ऐसे प्रयासो से सत्ता के करीब रहे कुछ लोगों को लाभ अवश्य प्राप्त होता रहता है।

राष्ट्रवादी मॉडल में आर्थिक व्यवस्था राष्ट्रीय सुरक्षा प्रतिष्ठान के लिए प्रतिबद्ध होती है। इसलिए सेना, वायुसेना तथा सुरक्षाबलों को मजबूत करने पर अधिक जोर दिया जाता है और उन पर भारी भरकम व्यय किया जाता है। इस व्यवस्था में सेना का इस्तेमाल न सिर्फ देश की सुरक्षा के लिए किया जाता है बल्कि सत्तारुढ़ दल द्वारा अपने विरोधियों के खिलाफ भी किया जाता है। इसके साथ-साथ सेना का इस्तेमाल उन तमाम सामाजिक वर्ग के दमन के लिए किया जाता है जो राष्ट्रवादी विचारधारा के विरोधी होते हैं।

राष्ट्रवादी मॉडल अर्थव्यवस्था में देश की सुरक्षा के नाम पर शस्त्रों पर बहुत अधिक व्यय किया गया है। मजे की बात तो यह है कि आर्थिक राष्ट्रवाद के बारे में ना तो कोई वैज्ञानिक सोच है, ना ही इस पर कोई प्रमाणित ग्रंथ मौजूद है, ना तो इस पर कोई अर्थशास्त्रीय अध्ययन हुआ है, और ना ही इस पर कोई प्रबुद्ध विचार-विमर्श हुआ है। इन सबके अलावा इसका कोई मानक अर्थशास्त्र मॉडल भी मौजूद नहीं है।

राष्ट्रवादी आर्थिक विचारधारा जोश और भावना पर आधारित होती है। यह खुद को हर तरह से सही और राष्ट्रहित में प्रदर्शित करती है। इसलिए इसका विरोध करने वाले लोगों को राष्ट्रद्रोही कहा जाता है। जिसके कारण चाहे कोई व्यवस्था हो या फिर आम जनमानस हो, इसका विरोध करने का साहस और समर्थन नहीं जुटा नहीं पाता हैं। ऐसे हालात में यदि कहीं से कोई आवाज उठती भी है तो उसे प्रभावी तरीके से कुचल दिया जाता है।

राष्ट्रवादी अर्थव्यवस्था की एक समस्या यह भी है कि आर्थिक और वित्तीय नीति के सभी साधन, चाहे वह मौद्रिक नीति हो, राजकोषीय नीति या योजना हो सब राष्ट्रवादी आर्थिक विचारधारा में हथियारबंद हो जाते हैं।

किसी विषय विशेष पर परास्नातक जो भी चाहते हैं वह करते हैं, और उसे सही ठहराने के लिए आंकड़ो को प्रस्तुत करते हैं। एक दिन सरकार मौजूदा करों को बढ़ाती है और उसे दस साल का दूरदर्शी कदम कहती हैं और महज तीन महीने बाद उन्हीं करों को कम करके उसे एक क्रांतिकारी कदम कहती हैं जैसा कि हमारी वित्तमंत्री ने किया।

तमाम सेंट्रल बैंक शासकों का व्यक्तिगत गुल्लक बन जाता है और वे लगातार कम ब्याज दरों की मांग करते हैं। सरकार की एजेंसियों का इस्तेमाल गैर-कॉर्पोरेट नागरिकों और विरोधियों के खिलाफ एक हथियार के रूप में किया जाता है।

संपूर्ण सोच और योजना प्रक्रिया एक पौराणिक आभा प्राप्त करती है। सभी योजनाओं और लक्ष्यों को बुलंद किया जाता है और जादुई सोच के साथ प्रभावित किया जाता है। वास्तविक तथ्यों की किसी भी जांच को अपवित्र माना जाता है। विवरण और प्रक्रिया के बारे में कोई प्रश्न पूछे बिना बोल्ड लक्ष्य और योजनाएं सीधे शानदार परिणामों को दर्शाती हैं। किसी भी तरह के सवाल पूछने या लक्ष्यों पर संदेह करने वाले को पेशेवर निराशावादी करार दिया जाता है। सत्ता के प्रमुख समर्थक सर्वश्रेष्ठ लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अपने शासकों पर भरोसा करने के लिए तैयार हो जाते है बिना कोई सवाल पूंछे।

अंत में, चूंकि सभी आर्थिक योजनाएं राष्ट्रवाद की भावना के कारण होती हैं इसलिए अवास्तविक लक्ष्यों को प्राप्त करने के प्रयासों को ही एक बड़ी उपलब्धि माना जाता है। लेकिन असफलता नेतृत्व की आभा को कम नहीं करती है। कहा जाता है कि आखिरकार, उन्होंने कम से कम कोशिश तो की। इसलिए यदि आप अभी भी इस बात को लेकर असमंजस में हैं कि मोदी की भाजपा सरकार बाजार के अनुकूल है या संरक्षणवादी, पूंजीवादी है या समाजवादी है तो आप बहुत पारंपरिक प्रतिमानों के साथ गलत सवाल पूछ रहे हैं। आप भ्रमित होने के लिए तैयार हैं और अगर आप मोदीभक्त नहीं हैं लेकिन फिर भी यह उम्मीद कर रहे हैं कि यह चक्रवाती रूप से धीमी हो रही यह अर्थव्यवस्था अंततः पुनर्जीवित हो जाएगी तो आप अपने आपको धोखा दे रहे हैं।

यह आर्थिक रुझान न तो रिवर्स होने वाला है और न ही चमत्कारिक ढंग से पुनर्जीवित होने वाला है। जब तक इस बात की हवा है भक्त सोचते हैं कि वे उड़ रहे हैं लेकिन वह खतरे को नहीं देख पा रहे हैं जो पूरी तरह से विनाशकारी दुर्घटना के रुप में परिवर्तित होगा। यदि भारतीय अर्थव्यवस्था को संकट से उभार कर वास्तविकता के धरातल पर लाना है। तो उसे अर्थनीति विरोधी ऐसी मूर्ख और भावनात्मक विचारधारा के नियंत्रण से बाहर आना होगा, जिसे राष्ट्रवाद कहते हैं। जिसने पिछली सदी में यूरोप के कई देशों को सर्वनाश का दंश दिया था। #

***

टिप्पणी पोस्ट करें