मीडिया मंथन : आखिर आध्यात्मिकता की राह में पत्रकारों की कठिनाइयां क्या हैं?

 


 भारतीय पत्रकारिता प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक दोनों ही अस्तित्व के संकट का सामना कर रहे हैं। जब लोग खुले तौर पर कहते हैं कि उनके पास एक राष्ट्रीय टेलीविजन समाचार चैनल को ब्लैकलिस्ट कर रखा है या एक प्रबुद्ध पाठक समाचार पत्र विक्रेता को दैनिक समाचारपत्र के बजाय टिशु पेपर बेचने के लिए कहता है तब यह बात स्पष्ट हो जाती है।

मेनस्ट्रीम मीडिया प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक दोनों के पत्रकारों को अनुबंध की नौकरियां देना दोषपूर्ण है। नए श्रम कानून के साथ वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट पत्रकारों के किसी भी विरोध के बिना दफन हो गया है। एक समय था जब कई प्रतिभाशाली लोगों ने पत्रकारिता के लिए अपनी बड़ी नौकरियां छोड़ दी जिनमें उच्च प्रशासनिक सेवाएं भी शामिल थी। मालिकों के साथ सरकार के सामने अपनी पूछ लहराते हुए पत्रकारों को देखकर लगता है कि भारतीय मीडिया की विश्वसनीयता शायद आज आजादी के बाद सबसे कम स्तर पर है।

पत्रकार को समसामयिक मुद्दों पर लिखने के लिए कहने की बजाय अखबार कुछ लोकप्रिय फिक्शन लेख या फिर किसी जनसंपर्क अधिकारियों द्वारा लिखित सामग्री को प्रकाशित करने के लिए कहते हैं। मनमोहन सिंह सरकार के दौरान शुरू किया गया यह काम आज खूब पनप रहा है इस आत्म-पराजित दृष्टिकोण का प्रभाव अब जमीनी स्तर पर भी दिखाई दे रहा है।

वर्तमान समय में समाचार पत्रों और टेलीविजन समाचार चैनलों के दर्शक समूह के स्तर में आई गिरावट से भी इनकार नहीं किया जा सकता है। अखबार के मालिकों का कहना है कि संपादकीय सामग्री के स्तर में गिरावट टेलीविजन चैनलों के कारण आई है। टेलीविजन चैनलों ने सोशल मीडिया को दर्शकों की संख्या में गिरावट के लिए जिम्मेदार ठहराया। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के मालिक यह मानने से इनकार करते हैं कि वह खबर को छोड़कर हर चीज को जगह दे रहे हैं।

भारतीयों को दूध और खाद्य पदार्थों में मिलावट की तरह लंबे समय तक मिलावटी जानकारी नहीं दी जा सकती है। भारतीय मीडिया पर इस निराशाजनक कहानी के बीच पत्रकारिता में अध्यात्मवाद पर जोर सिर्फ एक सपना ही प्रतीत होता है।

ब्रह्मकुमारियों के तत्वाधान में 21-22 सितंबर 2019 को माउंट आबू में मीडियाकर्मी और पत्रकारिता का दो दिवसीय अखिल भारतीय सम्मेलन मीडिया परिदृश्य को प्रभावित कर सकता था। अगर स्वतंत्रता और पत्रकारों की नौकरियों की सुरक्षा से जुड़े बुनियादी मुद्दे चर्चा में शामिल किए जाते। भारत के प्रमुख दैनिक समाचारपत्रों के जिले के संवाददाता वास्तव में समाचार देने वालों से पैसे लेकर अपना गुजारा करते हैं।

यह शिक्षक विहीन स्कूलों में मूल्य आधारित शिक्षा और आध्यात्मिकता के प्रचार सा प्रतीत होता लगा। यह एक सामान्य ज्ञान है कि अधिकांश निजी स्कूल के शिक्षकों के निर्धारित वेतन नहीं मिलता है। उन्हें अपनी नौकरियों को बनाए रखने के लिए स्कूल प्रबंधन को बैंक स्थानांतरण के माध्यम से मिलने वाले वेतन का 50 प्रतिशत से अधिक हिस्सा वापस करना पड़ता है। इसी तरह उच्च शिक्षा में बड़े पैमाने पर निजीकरण के साथ खराब स्थिति में है। मजे की बात यह है कि पत्रकारिता और शिक्षा जैसे बौद्धिक और वैचारिक क्षेत्रों में नियुक्तियों में अनैतिक प्रथाओं तथा खराब वेतन के बावजूद सरकारी नेताओं और समाज के बड़े वर्गों के लोग आशा करते हैं कि भारत विश्व गुरु होगा।

माउंट आबू के मीडियाकर्मी ब्रह्मकुमारी के डॉ. मृत्युंजय ने मीडिया में अध्यात्मवाद को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभाने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया गया। क्या वर्तमान सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दबाव के कारण मीडियाकर्मियों के लिए यह एक लंबा आदेश नहीं हैॽ जब तक हम यह सुनिश्चित नहीं करते हैं कि शिक्षक और मीडिया के लोग समाज में उचित आर्थिक संरक्षण प्राप्त करेंगे तब तक यह उम्मीद करना मुश्किल होगा कि वह अध्यात्मिकता वाले आदर्शों को अपने पेशे के मुख्य घटक के रुप में पालन करने में सक्षम होंगे। एक पत्रकार के रूप में हमें खुद को यह विश्वास दिलाना होगा कि किसी भी समुदाय की धार्मिक भावनाओं को आहत करना पत्रकारिता के सिद्धांतों के खिलाफ है। यह प्रेस की स्वतंत्रता नहीं है बल्कि यह धर्म का पालन करने वाले लोगों की भावनाओं को आहत करना है। एक आध्यात्मिक पत्रकार इसतरह के उत्तेजक लेखन में कभी लिप्त नहीं होता।

भारत में विभिन्न धर्मों के अनुयायियों के बीच कई विवाद हैं। इसमें से कुछ अधिकांश की उत्पत्ति तो मध्ययुग में उपनिवेशवाद शासनकाल के दौरान हुई। मध्ययुग के दौरान लड़ाई में विजयी हुई सैनिकों द्वारा धार्मिक स्थानों, शिक्षा केंद्रों को नष्ट करना और महिलाओं का शोषण सामान्य बात थी। लेकिन आज दुनिया बदल गई है। शस्त्र प्रणालियां कितनी क्रूर हैं कि परमाणु युद्ध से मानव समाज  का अस्तित्व समाप्त हो सकता है। अतः मीडिया को युद्धरत ब्रिगेड का हिस्सा नहीं बनना चाहिए।

कई लोगों का मानना कि मीडिया की स्वतंत्रता को सोशल मीडिया के प्रसार से खतरा है। क्योंकि सोशल मीडिया लोगों को नकली समाचार पढ़ने व गढ़ने में सक्षम बनाता है। यहां तक कि मेनस्ट्रीम अखबारों पर भी फेक न्यूज प्रकाशित करने का आरोप लगाया जा रहा है। इस चुनौतीपूर्ण स्थिति में अध्यात्मिकता का पालन करना एकमात्र आशा है। मीडिया की विश्वसनीयता सच्चाई पर निर्भर करती है और इसके लिए पत्रकार को आध्यात्मिक स्वभाव का होना आवश्यक है। #

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