विकास गाथा : भारतीय उद्योग जगत के पितामह “जमशेदजी टाटा”

 

ज जब उद्योग-धंधों के विकास के साथ भारत विश्व की आर्थिक महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है तब हम उस भविष्य दृष्टा को नहीं भूल सकते जिसने लगभग 150 वर्ष पूर्व भारतीय उद्योग की नींव डाली थी। वर्ष 1840 में जन्मे जमशेदजी टाटा भारतीय उद्योग जगत के पितामह कहे जाते हैं। जिन्होंने अपनी कर्तव्यनिष्ठा और लगन के साथ मध्ययुगीन भारत को आधुनिक युग तक पहुंचाने में एक सहाराहनीय भूमिका अदा की। आज जब धर्मांधता और संकीर्णतावादी मनोवृति से राष्ट्र ग्रसित है तब ऐसे में आवश्यकता है कि हमें जमशेदजी टाटा जैसे व्यक्तित्व से प्रेरणा लेकर राष्ट्र निर्माण के कार्य में पुन: लग जायें।

संसार में टाटा का नाम आयरन एंड स्टील कंपनी के प्रसिद्धि के कारण याद किया जाता है क्योंकि राष्ट्रमंडल में इस्पात निर्माण की यह सबसे बड़ी इकाई रही है। जमशेदजी टाटा ने अपना जीवन उस काल में व्यतीत किया है जिस काल में राजनैतिक और सामाजिक क्रांति हमारे देश में जन्म ले रही थी। समस्त देश स्वतंत्रता संग्राम में जूझ रहा था और हमारे महान वक्ता, लेखक, राजनीतिज्ञ और समाज सुधारक क्रांति का आह्वान कर रहे थे। किंतु जमशेदजी टाटा का मत था कि स्वच्छंद संसार में भारत अपना विशिष्ट स्थान तभी प्राप्त कर सकेगा जब औद्योगिक विकास में विशिष्टता रखता हो। भारत की प्राथमिक औद्योगिक प्रगति में और उसके विकास में उन्होंने अपना जीवन अर्पित किया। इस क्षेत्र में विशिष्ट सफलता प्राप्त करने हेतु उन्होंने अपना ध्यान इस्पात उद्योग, जल, विद्युत उत्पादन और विज्ञान की उच्च शिक्षा के लिए अखिल भारतीय संस्था के निर्माण में लगाया। राष्ट्रनिर्माण के अपने सिद्धांत में उन्होंने जहां इस्पात, विद्युत और वैज्ञानिक अनुसंधान को विशिष्टता दी, वहीं भारत के लिए मुंबई में ताज नामक सर्वप्रथम सर्वोत्कृष्ट श्रेणी के होटल का निर्माण करवाया तथा एक जल यातायात संस्था और कपास तथा अन्य उपजों की अभिवृद्धि के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी प्रदान किया। 


जमशेदजी टाटा का जीवन एक परिचित कहानी है किंतु आज स्मरणीय है। वह भावना जो जातीय अथवा प्रांतीय से सर्वथा सर्वोपरि थी। जमशेदपुर में टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी की स्वर्ण जयंती के अवसर पर 3 मार्च 1958 को भाषण देते हुए प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि “वर्तमान काल में हम अपने पूर्वजों द्वारा किए गए कृत्य पर विचार कर सकते हैं और उन परिस्थितियों और कठिनाइयों का भी सहज अनुमान लगा सकते हैं जो उन्होंने भोगी होगी। हमारे देश के कुछ नवयुवक वास्तव में साहसी हैं। क्योंकि साहसी होना साधारण बात नहीं है बशर्ते कि हमें वातावरण और अवसर प्राप्त हो सके। उलझने और अड़चने तो उस समय आती हैं जब आप समूह में नहीं वरन अपने आप में ही प्राथमिक रूप में साहसी हों। जब व्यक्ति व्यवहार में नेतृत्व करता है और उसके विचार तत्कालीन विचारों के अनुरूप स्वीकृत नहीं होते, ऐसे ही समय सही साहस का परिचय मिलता है। फिर भले वह शारीरिक हो, वैचारिक हो अथवा आध्यात्मिक हो इसे कोई भी संज्ञा दी जा सकती है और इसी प्रकार के साहस और सपने को श्री जमशेदजी टाटा ने संजोया था जिसे उन्होंने साकार कर दिखाया। आधुनिक भारत के निर्माता में उनका नाम परम श्रद्धा और आदर के साथ लिया जाना चाहिए।”


श्री जमशेदजी टाटा से जब उनकी सफलता विषय में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि “सच्चे और सामान्य व्यापारिक सिद्धांत ही उनकी सफलता के कारक हैं। उनका व्यापारी मस्तिष्क श्रमिक के प्रति आस्था और विश्वास रखता रहा है।” उन्होंने सदैव ही यह प्रयास किया है कि श्रमिकों को पर्याप्त सुविधाएं प्रदान हों। प्रोविडेंट फंड, बोनस, शैक्षणिक योग्यताएं, क्रीड़ा, पुस्तकालय तथा इसी प्रकार के विशिष्ट सुविधाएं श्री जमशेदजी टाटा ने पहली बार वर्ष 1877 में इस्प्रेस मिल में स्थापित की थी और व्यापारिक एवं औद्योगिक संस्थानों में एक विशिष्ट उदाहरण स्थापित किया। क्योंकि उद्योगों से उन्हें विशेष स्नेह था। अतएव मिलों और फैक्ट्रियों के आसपास के पिछड़ेपन को देखकर वे प्रायः उदास हो जाए करते थे। वर्ष 1902 में जब वे अपने इस्पात उद्योग के संबंध में विदेश भ्रमण पर गए थे तो उन्होंने अपने पुत्र दोराबजी टाटा को लिखा था कि “चौड़ी सड़कों के आसपास छायादार वृक्ष अवश्य लगाया जाए। ये वृक्ष ऐसे होने चाहिए जो शीघ्र ही पल्लवित होने वाले हों। उद्योगों और मैदानों के लिए पर्याप्त खुले स्थान नियत किए जाएं। फुटबॉल तथा हॉकी आदि के लिए विशिष्ट क्रीड़ोद्यान बनवाने भी आवश्यक हैं। मंदिरों, मस्जिदों और चर्चों के निर्माण की भी सुविधा भी आवश्यक है।” वे केवल इस्पात उद्योग का श्री गणेश नहीं करना चाहते थे, वरन इस उट्योंग के सहयोगी कर्मचारियों के लिए सुंदर नगर की भी कल्पना करते थे, जहां उनका निवास हो सके और सुख शांति का जीवन व्यतीत कर सकें।


टाटा उद्योगों द्वारा अर्जित धन का प्रायः 83 प्रतिशत टाटा ट्रस्ट द्वारा नियोजित टाटा उद्योग के कर्मचारियों के कल्याण में व्यय किया जाता है। इस टाटा ट्रस्ट का निर्माण उनके पुत्रों दोराब और रतन जी द्वारा किया गया था। जमशेदजी टाटा के विचारों के अनुरूप ही ट्रस्ट का निर्माण किया गया। जहां इस प्रकार की कल्याणकारी योजनाओं का परिचालन होता है। उन्होंने इसे भली-भांति अनुभव किया था कि व्यक्ति के द्वारा कल्याणकारी कार्य भले वे छोटे या बड़े हों धनी उद्योगपतियों द्वारा होने अति आवश्यक है। इसी में उनकी सामाजिक चेतना निहित हैं। 


“भारतीय  हर दृष्टि से आत्मनिर्भर होना चाहिए और यही उसकी प्रवृत्ति होनी चाहिए।” यही उनका उद्देश्य था और यह उनकी दार्शनिकता का मुख्य आशय था। बैंगलोर में अनुसंधान संस्थान की स्थापना के पर्याप्त पूर्व वर्ष 1892 में उन्होंने भारतीयों के लिए इंग्लैंड में उच्च शिक्षा प्राप्त करने हेतु एक संस्था का भी निर्माण किया था। प्रखर बुद्धि किंतु असहाय विद्यार्थियों को विदेश में शिक्षा प्राप्त करने की विशिष्ट सुविधा दी थी। उनके लौटने पर जो धन उन पर व्यय होता था वह सामान्य किस्तों में वापिस कर लिया जाता था। जमशेदजी टाटा अपने विद्यार्थियों पर गर्व करते थे और उनकी सफलता में विशेष रुचि प्रदर्शित करते थे। टाटा के विद्यार्थियों ने भारतीय शासन में अपनी विशेषताएं प्रदर्शित की हैं।


जमशेदजी टाटा वास्तव में देश के भाग्य निर्माता में थे टाटा संस्थान के अध्यक्ष जेआरडी टाटा ने ठीक ही कहा था कि “उनके जन्म के क्षण, उनका जीवन, उनकी प्रतिभा, उनका व्यवहार, उनके जीवन के विभिन्न घटनाएं और उनकी सेवाएं जो उन्होंने देश के लिए की है और भारतीयों के लिए की है वह संभवतः भारत के भाग्य निर्माण के लिए पूर्व निरुपित थी।” #

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