संस्मरण : भारतीयता के प्रतीक “शास्त्रीजी”

लाल बहादुर शास्त्री ने पंडित जवाहरलाल नेहरु की मृत्यु के बाद जून 1964 प्रधानमंत्री का पद संभाला। 10 जनवरी 1966 की रात को ताशकंद में उनकी मृत्यु हो गई। कुछ 19 महीने से भी कम समय वह देश के प्रधानमंत्री रहे। उनका यह छोटा सा शासनकाल पाकिस्तान के साथ युद्ध और भयानक देशव्यापी सूखे के कारण अत्यंत संकटमय रहा। पर इन सबके बावजूद इस छोटे से कलखंड में शास्त्री जी ने देश के जनमानस पर अपनी गहरी छाप छोड़ी। 


अब प्रश्न यह उठता है कि लाल बहादुर शास्त्री के व्यक्तित्व में ऐसा क्या था जिसके चलते वह इतने कम समय में सर्वाधिक लोकप्रिय नेता बन गए। शास्त्री जी देखने-सुनने में बहुत अधिक आकर्षक नहीं थे। वह न बड़े विद्वान थे और ना ही ओजस्वी वक्ता थे। जब नेहरु जी के अंतिम दिनों में लोगों ने कहा कि क्या आप प्रधानमंत्री बनेंगे तो उन्होंने कहा कि उनमें प्रधानमंत्री बनने के गुण ही नहीं हैं। पर फिर भी शास्त्री जी जनमानस के इतने लोकप्रिय नेता बनकर उभरे।


कहा जाता है कि शास्त्री जी अपनी सादगी और सरल व्यक्तित्व के कारण भारत के आम आदमी के समान थे और इसलिए आम जनता के बीच लोकप्रिय हो सके। यह बात पूरी तरह उचित नहीं क्योंकि शास्त्री जी उच्च, मध्यम और निम्न वर्गों में भी उतने ही लोकप्रिय थे। पंजाब और महाराष्ट्र जैसे विकसित राज्यों तथा उनके तेजतर्रार नेताओं के बीच शास्त्री जी की लोकप्रियता देखते ही बनती थी। 


सच तो यह है कि शास्त्री जी ने भारतीय जनता के हर वर्ग को प्रभावित किया था और उनको अनुभूति के स्तर पर छुआ था। वह भारतीय प्रतीक अवश्य थे पर समस्त भारतीयता केए न कि केवल अभावग्रस्त भारतीय के। शास्त्री जी ने भारतीय राजनीति और राजनीतिक चिंतन के माध्यम से जनजीवन को यह सहजता दी जो नेहरू युग की तार्किक बुद्धिजीविता से अलग थी। इस तरह उन्होंने भारतीय राजनीति को वास्तविकता के धरातल पर लाने का प्रयास किया। सैद्धांतिक विचारतंत्र से देश की राजनीति को निकाल कर उन्होंने इसे आम आदमी के लिए सुगम और ग्राह्य बनाया तथा इसके द्वारा भारतीय जनतंत्र का आधार व्यापक किया। यह उनका बहुत बड़ा योगदान था। 


शास्त्री जी राजर्षि थे। वह सत्ता में रहते हुए भी सत्ता के मोह से दूर रहे। रेल मंत्री के रुप में रेल घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पद त्याग करके उन्हें राजनीति के उच्चतर मूल्यों को बल दिया। उनकी कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं थाए न ही उनके किसी काम में दिखावा था। शास्त्री जी के त्यागए उनकी ईमानदारी और निष्ठा ने सब लोगों को एक साथ प्रभावित किया। श्जय जवानए जय किसानश् का नारा देकर उन्होंने देश में श्रम के महत्व को सम्मान दिया। 


यह आश्चर्य की बात है कि वर्ष 1966 में गुजरे इस सीधे-साधे छोटे कद के आदमी का नाम आज के बड़े तड़क-भड़क हाईटेक नेताओं के मन में खौफ पैदा करता है। आज कुछ लोग तो पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह की सादगी और ईमानदारी को लाल बहादुर शास्त्री द्वारा स्थापित मूल्यों की परछाई कहते हैं। 


यदि शास्त्री जी अकाल मृत्यु के शिकार न होते तो देश का भविष्य कैसा होता “लगता है आज देश का स्वरूप कुछ और ही होता” देश में काले धन के अर्थव्यवस्थाए उससे उत्पन्न एक विकृत संस्कृति तथा आधुनिकीकरण के नाम पर आया भौड़ा विदेशीपन न होता। क्योंकि शास्त्री सब लोगों को साथ लेकर चलने की कला जानते थे। इसलिए सांप्रदायिक तनाव इतना ना होता। काफी समस्याएं उनके नैतिक बल के प्रबाव से सुलझ जाती। इसके बाद के नेता गाँधी.नेहरू के सबसे समग्र शस्त्र नैतिक बल का प्रयोग करने में असमर्थ रहे। क्योंकि उनका व्यक्तित्व इतना ऊंचा न था। 


शायद इससे भी बड़ी बात यह है कि शास्त्री जी के साथ हम भारतीय अस्मिता के स्वरूप को विकसित कर पाते जो हम अभी तक नहीं कर पाए हैं। आपसी टकरावए तनाव और टूटने की हमारी तमाम समस्याएं भारतीय अस्मिता के स्वरूप का विकास और उसको परिभाषित न कर पाने के कारण ही है।

जय जवान जय किसान
वर्ष 2005 में लाल बहादुर शास्त्री के अमर उद्घोष “जय जवान जय किसान” के नाम पर ·“जय जवान जय किसान फोरम” का गठन किया गया। इस राजनैतिक फोरम के उद्घाटन समारोह पर सभी राजनैतिक दलों के नेताओं सहित काफी नामी-गिरामी व्यक्ति उपस्थित थे। लाल बहादुर शास्त्री का नाम कितना प्रेरणादायक है इसका उदाहरण इस बात से मिला कि दिल्ली का सबसे बड़ा सभागार खचाखच भरा था और लोग खड़े होकर इस महापुरुष की स्मृति में बोले जाने वाले वचन सुन रहे थे। 



फोरम का नेतृत्व लाल बहादुर शास्त्री के पुत्र और भाजपा नेता सुनील शास्त्री कर रहे थे जो आज राष्ट्रीय राजनीति के हाशिए पर आ गए हैं। इस बात में कोई शक नहीं है कि लाल बहादुर शास्त्री जी के चार पुत्रों में (दो अब दिवंगत हो गए हैं) सुनील शास्त्री उनकी राजनैतिक विरासत के सबसे दमदार वारिस माने जाते हैं। 


कांग्रेस शासन काल में सुनील शास्त्री उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री थे और उनकी गणना सफल मंत्रियों और भावी मुख्यमंत्री के रूप में की जाती थी। फिर राजीव गांधी की हत्या के बाद पूरा राजनीतिक परिदृश्य बदल गया और सुनील शास्त्री का राजनैतिक सितारा भी काग्रेस के सितारे के साथ डूबता गया। फिर सुनील शास्त्री कांग्रेस छोड़कर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल हो गए। 


पिछले दिनों एक साक्षात्कार में हमने सुनील भाई से पूछा कि वह कांग्रेस पार्टी की अपनी विरासत छोड़कर भाजपा में क्यों शामिल हुए सुनील जी ने उत्तर दिया कि उस समय के काग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी उनको पसंद नहीं करते थे। केसरी जी के समय काग्रेस नेहरू.शास्त्री.इंदिरा जी की काग्रेस न रहकर कुछ निहित स्वार्थों की पार्टी बन गई थीए इसलिए उन्होंने काग्रेस छोड़ दी थी। 


अब प्रश्न यह है कि जब कांग्रेस का पुनरुद्धार हो रहा है तो क्या सुनील शास्त्री कांग्रेस में वापस आएंगेघ् इस प्रश्न पर वह खामोश रहते हैं। पर यह बात तो साफ है कि भाजपा में सुनील शास्त्री खुश नहीं है। एक बात तो यह है कि भाजपा ने उन्हें उचित सम्मान तथा दर्जा नहीं दिया। 


लेकिन इससे बड़ी बात यह है कि गाँधीवादी कांग्रेस व शास्त्री जी की उदारवादी राजनैतिक संस्कृति में पले-बढ़े सुनील शास्त्री भाजपा की संकीर्ण हिंदुत्व विचारधारा में मनोवैज्ञानिक रूप से मिसफिट हैं। उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा कि वे राजनैतिक मुख्यधारा में रहना चाहते थे और क्योंकि मुख्यधारा में कांग्रेस का विकल्प भाजपा ही थी इसलिए भाजपा में शामिल हुए। 


सुनील शास्त्री बड़े नेता हों न हों पर आज भी लाल बहादुर शास्त्री के नाम में जादू है। आज के कुर्सीप्रेमी नेताओं के लिए लाल बहादुर शास्त्री की जीवन शैलीए त्याग और निस्वार्थ देशप्रेम पर एक ऐसा दर्पण है जिसमें उन्हें अपनी भ्रष्ट और अपराधी छवि दिखाई देती है और यह उन्हें बहुत कमजोर हो परेशान कर देती है। #

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