विचार-विमर्श : आखिर इस बलात्कारी प्रवृत्ति के मूल में क्या है?

 


उन्नाव बलात्कार कांड की आग अभी ठंडी भी ना हुई थी कि हाल ही में हैदराबाद में हुए बलात्कार और हत्या कांड ने देश को झकझोर दिया है। इस शर्मनाक कांड से न केवल अपने देश पर गर्व करने वाले हम सब नागरिक शर्मसार हुए बल्कि हमारी प्रशासनिक व्यवस्था, शिक्षा तंत्र, पारिवारिक संस्कृति और सामाजिक वातावरण पर भी गंभीर प्रश्न खड़े हुए हैं। 

लगातार देश के कई देश क्षेत्रों से आने वाली बलात्कार की घटनाएं इस बात का द्योतक हैं कि बलात्कार मात्र कानून और व्यवस्था की समस्या नहीं है। इसका संबंध उस मानसिकता से है जो ऐसी पाश्विक प्रवृत्ति को जन्म देती है जिससे बलात्कारी अपने घृणित कार्य के परिणामों को जानते हुए भी एक खूंखार जानवर की तरह व्यवहार करता है। स्पष्ट है कि इस कार्य में उसको यौन संतुष्टि से कहीं ज्यादा अपने उस आक्रोश की अभिव्यक्ति मिलती है जो हीनभावना, उपेक्षित व्यवहार, असंतुष्ट जीवन और अतृप्त इच्छाओं के कारण उसके असंयमित व्यवहार और अनबूझ चरित्र का अंग बन जाता है। 

यदि हमें इस घटित प्रवृत्ति से समाज की रक्षा करनी है तो हमें उस पर गंभीर चिंतन की आवश्यकता है जो हमारे बदलते समाज के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जैसे समस्त आयामों को अपने में समाहित करे। यह प्रश्न विचारणीय है कि शिक्षा, अर्थव्यवस्था, नई तकनीकी तथा मीडिया में निरंतर विकास के बाद बलात्कार की घटनाएं क्यों बढ़ रही? क्या पूंजीवादी आर्थिक विकास के साथ आए हुए उपभोक्तावाद या डिजिटल मीडिया के फैलाव का इस बढ़ती बलात्कारी मनोवृत्ति से कोई संबंध है या फिर हमारा रूढ़िवादी समाज जिसके मानस पटल पर भारतीय नारी की पारंपरिक छवि है। 

नारी स्वतंत्रता आंदोलन के साथ हुई घर से स्वतंत्र और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर तथा स्वच्छंद नारी की छवि को समझने और स्वीकार करने में असफल तो नहीं है। क्या समाज के क्रमिक और सहजग्राह आधुनिकीकरण की जगह भारतीय नारी बहुत तेजी से स्वतंत्रता की ओर बढ़ते हुए कहीं ऐसे उन्मुक्त छवि का सृजन तो नहीं कर रही है जो समाज के एक बहुत बड़े वर्ग के लिए आत्मसात कर पाना बहुत कठिन है। इस वर्ग का इस परिवर्तन को अस्वीकार करने की अभिव्यक्ति तो नहीं? क्या यह आधुनिकता की दौड़ में पिछड़ जाने का आक्रोश तो नहीं है जो असहाय बालिकाओं और युवा महिलाओं पर कहर बरसा रहा है। हमको इस विरोधाभास को भी समझना होगा कि क्या कारण है कि जब हम शिक्षा और आर्थिक विकास के क्षेत्र में पिछड़े थे तब बलात्कार की घटनाएं कम थीं और शिक्षा के विकास तथा आर्थिक  संपन्नता के युग में बढ़ गया है?

इन सब सवालों को जानने व समझने के लिए हमें सामाजिक, आर्थिक तथा मानवीय आवश्यकताओं को बारीकी से समझना होगा। आज विश्वव्यापी भौतिकतावाद अर्थव्यवस्था का सबसे अधिक प्रतिकूल प्रभाव महिलाओं पर पड़ा है। आधुनिकता के नाम पर भारतीय महिलाएं अब पहले की तुलना में अधिक स्वच्छंद और उन्मुक्त हुई हैं। सामाजिक पारम्पराएं, सांस्कृतिक विरासत और रुढ़िवाद के लिए प्रसिद्ध भारतीय महिलाओं के बारे में एक अमेरिकी विशेषज्ञ ने लिखा कि वे अब अत्यंत स्वछन्द व कामुक हैं और उनकी यौन पिपासा खतरनाक स्तर तक पहुंच चुकी है तो सहसा विश्वास नहीं हुआ है। लेकिन यह सच है कि बीसवीं शताब्दी के अंतिम दो दशकों में भारतीय महिलाओं की सामाजिक सोच में काफी परिवर्तन आया है। अब भारतीय महिलाएं न सिर्फ घर की चारदीवारी को बहुत पीछे छोड़ आई हैं अपितु यौन स्वतंत्रता के संबंध में पाश्चात्य देशों की महिलाओं से भी टक्कर ले रही है। 

यदि अमेरिका, ब्रिटेन, थाईलैंड, कोरिया, फिलीपींस, हांगकांग, ताइवान और सिंगापुर की महिलाएं “यौन स्वतंत्रता” के युग में रही हैं तो भारत की महिलाएं भी कहीं पीछे नहीं हैं। महानगरों और बड़े शहरों की समृद्ध अभिजात्य परिवारों की युवतियां और महिलाएं लाज और संकोच के सारे बंधन तोड़ कर अब स्वतंत्र सेक्स के माहौल में गुजर बसर कर रही हैं। छोटे शहरों, कस्बों और गांवों के मध्यम वर्ग के परिवारों में स्वतंत्रता चाहे खुले तौर पर न दिखती हो लेकिन पुराने बंधन निश्चित रूप से ढीले पड़े नजर आते हैं और इस वर्ग की महिलाएं भी स्वतंत्र यौन संबंधों की रुपहली दुनिया में प्रवेश को आतुर दिखती हैं। 

आजकल महानगरी संस्कृति में पली-बढ़ी नवयुवतियों में अवांछित उत्तेजना उत्पन्न करने वाले परिधान पहनने और अधिकाधिक अंग प्रदर्शन करने की होड़ सी लगी हुई है। जिसका उद्देश्य फैशन व तड़क-भड़क की दुनिया में युवतियों को एक ऐसी उलझन में डाल देता है कि फिर कुछ बांकी नहीं बचता। ढेर सारे बॉयफ्रेंड, डेटिंग, आधुनिकता और फास्ट होने के नाम पर युवतियां वह सब कुछ कर गुजरती है जिसे करने से उनका मन उन्हें रोकता है। वे जानती हैं कि यह सब अनैतिक व काफी खतरनाक है लेकिन “अल्ट्रा मॉड” बनने के चक्कर में वे अपना नारीत्व और सतीत्व भी दॉव पर लगा देती हैं।

इस आधुनिक दौर में विश्वविद्यालय परिसर और कॉलेजों में उन्मुक्त यौन संबंधों के प्रति युवाओं को रुझान लगातार बढ़ता जा रहा है। महानगर में किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार जीवन के इक्कीस बसंत देखने और विवाह होने से पूर्व ही 46 प्रतिशत छात्राएं रतिक्रिया में प्रतिक्रिया की अभ्यस्त हो चुकी होती हैं और छात्रों में यह प्रतिशत 67 का आंकड़ा छू रहा है। यह तो लगभग परिपक्व युवतियों की बात है लेकिन स्कूली छात्रों में भी किया गया सर्वेक्षण तो सच में आँखे खोलने वाला है।  एक आधुनिक इलाके की स्कूल छात्राओं के बीच किए एक सर्वेक्षण के अनुसार 13 वर्ष से कम उम्र की 7 प्रतिशत और 16 वर्ष तक कि 19 प्रतिशत अबोध बालिकाएं भी यौन सुख भोग चुकी हैं। शेष छात्राओं में से 21 प्रतिशत छात्राएं आनंद लेना चाहती हैं लेकिन स्थान के अभाव और सही साथी के अभाव में फिलहाल वे इस परम सुख को पाने से वंचित रहीं है। ये मासूम बच्चियां किसी शारीरिक मजबूरी के कारण अपने सहपाठियों से संबंध नहीं बनाती हैं बल्कि अपने आपको आधुनिक व ग्लैमरस साबित करने और “बॉयफ्रेंड” रखने वाली अपनी सहेलियों के सम्मुख हीन न बनना चाहने के कारण ऐसा करती हैं। 13 वर्ष से कम उम्र के अधिकतर छात्राओं को यौन क्रिया के दौरान न तो कोई उत्तेजना पैदा हुई और ना ही कोई विशेष आनंद का अनुभव हुआ, वह तो सिर्फ देखी गई फिल्मों की अभिनेत्रियों की क्रियाओं को दोहरा कर आत्म संतुष्टि पाना चाहती थीं। 

नवयुवतियों में बढ़ रहे इस व्यभिचार के लिए सिर्फ फिल्मों को ही दोष नहीं दिया जा सकता। भौतिकता की दौड़ में लगी युवतियां भी  अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए उन संबंधों का सहारा लेती हैं।  मुंबई विश्वविद्यालय के अधिकतर युवतियां, एक-दो बड़े घर के लड़कों को फंसा कर सारे दिन उन्हें अपने साथ रखती है। सारे दिन में उनकी लंबी गाड़ियों का उपयोग करती हैं और महंगे होटल में खाना खाती है और फिर शाम को बस स्टैंड की चट्टानों के पीछे जुहू-बीच पर खड़ी गाड़ियों में या फिर किसी होटल में वे सारा हिसाब चुका देती हैं। वह एक-दूसरे की इच्छापूर्ति करके अपने अपनी जमापूंजी वसूल कर लेते हैं। मुंबई और बेंगलुरु की यह संस्कृति दिल्ली तथा अन्य महानगरों में बड़ी तेजी से अपने पैर पसार चुकी है। 

सामाजिक मान्यताओं और पारम्पराओं को जी भर कोसने वाली और आधुनिकता का राग अलापने वाली छात्राएं और युवतियां कितनी मुक्त या उन्मुक्त हैं, इसका नजारा दिल्ली के लोधी गार्डन, बुद्धा गार्डन, नेहरु पार्क, सफदरजंग का मकबरा, पुराना किला और मजनू का टीला पर आसानी से देखा जा सकता है।  यौन उन्मुक्तता के पक्ष-विपक्ष में तर्क हो सकते हैं लेकिन इतना तो निश्चित है कि “सेक्स” एक नितांत व्यक्तिगत चीज है और इसे सार्वजनिक रुप से नहीं किया जाना चाहिए।  लेकिन यौन व्यवहार का प्रदर्शन किस प्रकार की अधिकता का द्योतक है, समझ में नहीं आता है। नैतिक आचार संहिता से जुड़ा “सेक्स” सामाजिक और प्रारंभिक जीवन की नींव है। उसके दुरुपयोग एवं संबंधों को काफी विकृत बना दिया है। अब तो विवाह के पूर्वी ही यौन सुख प्राप्त करने और साथ-साथ रहने का चलन भी आम बात हो चुकी है। 

इस प्रकार की अनैतिक यौन स्वच्छंदता के पक्षकारों को कहना है कि भयंकर महंगाई कारण हमारे देश में करोड़ों की स्त्री-पुरुष ऐसे हैं जो विवाह जैसे महंगे सौदों को झेल नहीं सकते। आखिरकार उनकी भी तो शारीरिक जरूरतें है, अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए उनको यौन स्वच्छंदता देना चाहिए। कितनी वाहियात मांग है यह किसी के साथ भी यौन संबंध बनाने की स्वतंत्रता देना क्या विवाह का विकल्प हो सकता है। यदि इस मांग को माना गया तो क्या विवह जैसी पवित्र जिम्मेदार संस्था के औचित्य पर ही प्रश्न नहीं लग जाएगा। ऐसी किसी यौन स्वतंत्रता को सामाजिक मान्यता देने से हमारे सामाजिक व पारिवारिक जीवन में जो पशुता और बदहाली का माहौल बन जाएगा उसकी कल्पना शायद हीं कभी की जा सकती है। इस बेशर्मी के पक्षधर कहती हैं कि बहुत से युवकों के साथ यौन संबंध स्थापित करने से हम में आत्मविश्वास और निडरता उत्पन्न होती है। 

बदलते सामाजिक परिवेश और महानगरी चमक-दमक अभिजात वर्ग युवतियों में नैतिकता का बिल्कुल लोप कर दिया है। पति-प्रेम, स्नेह, वात्सल्य, ममता और त्याग की प्रतिमूर्ति माने जाने वाली नारी आज पाश्चात्य संस्कृति की चकाचौंध में खोकर खुद के गौरवशाली अतीत को भूलती जा रही है। घर की चारदीवारी से निकल कर उसके क़दमों उन्मुक्त वातावरण में तफरीह को निकल पड़े हैं। महंगी शराब पीना, होंठो से सिगरेट, डिस्कोथेक में नाचना, क्लबों व पांचसितारा होटलों में गैर मर्द के साथ गुलछर्रे उड़ाना इन तथाकथित प्रगतिशील और अत्याधुनिक युवतियों की दिनचर्या का अंग बन चुके हैं। 

महानगरों युवतियों की इस अनैतिक यौन-स्वच्छंदता और तथाकथित आधुनिकता के कारण हमारे सामाजिक संहबंध दरकने लगे हैं। विडंबना ही है कि जब पश्चिमी देश एक लंबे समय से हमारी पुरातन संस्कृति में शांति खोजने का प्रयास कर रहे हैं और असफल हो चुकी उनकी पाश्चात्य संस्कृति और मान्यताओं को अपनाकर आज हम “आधुनिकता” का ढोल पीट रहे हैं। भारतीय युवतियों में निरंतर बढ़ रही इस यौन स्वच्छंदता और उन्मुक्तता को यदि समय रहते भारतीय परिपेक्ष्य में परिभाषित नही किया गया तो काफी देर हो चुकी होगी समाज को सही दिशा में ले जाने में। अंततः शायद यह कहना गलत नहीं होगा कि चाहे स्त्री हो या पुरुष उसे भारतीय मानको, सामाजिक मान्यताओं और आदर्शों को समझने व उसे संजोकर रखने की महती आवश्यकता है। #  

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