अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य : सत्तारुढ़ राष्ट्रपति ट्रम्प को चुनाव हराना है मुश्किल

 

ज भारत और अमेरिका के पारस्परिक संबन्ध एक बहुत मैत्रीपूर्ण है। इसका कारण यह है कि दोनों देश एक दूसरे के हितो के पूरक है। भारत को अमेरिका की तकनीकी और पूंजी निवेश की आवश्यकता है तो अमेरिका विश्व में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए भारत को सबसे समर्थ सहभागी मानता है। अमेरिका के पिछले कई राष्ट्रपतियों के शासन काल में भारत-अमेरिकी संबन्धो में जो सुधार हुए उसमें मोदी-ट्रम्प काल में नए प्रतिमान स्थापित किये है। ऐसी स्थिति में हमारे लिए यह बड़ा अहम प्रश्न है कि क्या राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प इस वर्ष के अंत में होने वाले चुनाव में फिर से राष्ट्रपति चुन कर आएंगे या फिर भारत को अमेरिका के नए राष्ट्रपति साथ संबन्ध की राह तलाश करने होंगे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भी आज तमाम विवादों में घिरे हुए हैं। उनकी विदेश नीति तथा आर्थिक दृष्टिकोण पर अमेरिका में तमाम प्रश्न उठाये जा रहे हैं, यहाँ तक कि अमेरिकी संसद में उन पर महाअभियोग लगाने की तैयारी भी हो रही है। जिसको देखकर ऐसा लगता है कि शायद उनका फिर से चुन कर वापस आना मुश्किल है।

मीडिया मैप के प्रतिनिधि अमित कुमार ने यह प्रश्न अमेरिकी राजनैतिक मामलो के गहरे जानकार रामतनु मैत्रा से पूछा जो आजकल भारत आये हुए हैं। 75 वर्षीय रामतनु भारतवंशी अमेरिकन है जो भू-राजनैतिक विषयो में अनुसन्धान के साथ-साथ अमेरिका के तमाम शोधपत्रों और समाचार पत्र-पत्रिकाओं में अंतर्राष्ट्रीय मामलों पर लिखते रहते हैं। राष्ट्रपति ट्रम्प के अतिरिक्त हमने उनसे भारत के सन्दर्भ में पाकिस्तान और चीन के प्रति अमेरिका की विदेश नीति तथा अन्य विषयो पर बातचीत की। रामतनु मोइत्रा से हुई बातचीत के कुछ अंश इस प्रकार से हैं -

अमेरिकी राजनीति किधर जा रही है? क्या राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प सफल राष्ट्रपति माने जाते है और उनके दोबारा चुनकर आने की क्या सम्भावना है?

यह एक मुश्किल सवाल है अमेरिकी अर्थव्यवस्था ठीक है और जिसका जीडीपी 20 ट्रिलियन डॉलर्स से अधिक हो उसको बदलना या उसका संकटग्रस्त होना मुश्किल है। ट्रम्प सफल है या असफल यह नहीं कहा जा सकता। लेकिन वह चीन को समस्या मानते है और उसे घेरना चाहते है जिसमे उन्हें अभी सफलता नहीं मिली है। आज अमेरिकी राजनीति, भारतीय राजनीति की तरह हो गयी है जिसमे विपक्ष बहुत कमजोर है।

ट्रम्प को अमेरिका में ज्यादा पसंद नहीं किया जाता है। लेकिन अमेरिकी राजनीति ऐसी है की यदि आप एक बार राष्ट्रपति बनते है तो दूसरी बार आपका राष्ट्रपति बनना तय है। सत्ता में बैठे राष्ट्रपति को हराना मुश्किल होता है। जहा तक मुझे याद है सिर्फ जॉर्ज एच डब्ल्यू बुश को बिल क्विलंटन ने हराया था। उससे पहले आप अगर रोसवैल्ट से शुरू करे तो हमेशा सत्तारूढ़ राष्ट्रपति ही दूसरी बार चुनकर आता है।

ट्रम्प जीतेंगे जरूर पर ट्रम्प पसंद नहीं किये जाते। अमेरिकन लोग ट्रम्प को केवल इसलिए पसंद करते है क्योंकि वो (ट्रम्प) बदलाव लाने की कोशिश कर रहे है क्योंकि वो समझते है अमेरिका जिस राह पर चल रहा वो गलत है। ट्रम्प ने इसे बदलने की जो प्रक्रिया शुरू की हुई है उससे 4-8 साल में बदलाव नहीं आएगा। लेकिन प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और बहुत से लोगो को यह पसंद आ रहा है। मैं उन्हें एक सफल राष्ट्रपति नहीं कहूंगा। लेकिन अगर वह ईरान के साथ युद्ध करते है तो वह चुनाव हार सकते है। क्योंकि अमेरिकी जनता किसी भी कीमत पर युद्ध नहीं चाहती है। इसके विपरीत अगर वह युद्ध करने से बचते है तो वह (ट्रम्प) अच्छे बहुमत से चुनाव जीत जायेंगे।

 

आज पाकिस्तान के नेता, मीडिया और बुद्धिजीवी अमेरिका को अपना दुश्मन मानते हैं इसका क्या कारण है? अमेरिका-पाकिस्तान के सम्बन्धो का क्या भविष्य है? इनका भारत पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

पाकिस्तान अपनी अर्थव्यवस्था को बनाये रखने के लिये अमेरिका और सऊदी अरब पर ही निर्भर है। बात यह है कि पाकिस्तान, सऊदी अरब पर निर्भर करता है और सऊदी अरब अमेरिका के साथ है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या अफगानिस्तान के मामले में पाकिस्तान अमेरिका की सहायता करेगा या नहीं। अमेरिका इस बारे में थोड़ा परेशान है।

पाकिस्तानी मीडिया जो अमेरिका-पाकिस्तान विवाद दिखता है, वह सच नहीं है। अमेरिका पाकिस्तान से कोई बड़ी आशा नहीं रखता है। लेकिन जिस तरह से चीन पाकिस्तान में घुस गया है वह अमेरिका को पसंद नहीं है। पाकिस्तान चीन की तरफ और नहीं जाये इसलिए अमेरिका पाकिस्तान की आर्थिक व सैनिक सहायता करता रहेगा। पाकिस्तान के नेता और अमेरिका विरोधी विचारधारा वाले पाकिस्तानी बुद्धिजीवी अपने लोगो को खुश करने के लिए अमेरिकी-पाकिस्तानी मतभेद की बात करते है।

भारत-अमेरिका संबन्धो पर इसका कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि अमेरिका जब भी पाकिस्तान से कोई डील करता है उसमें भारत का कोई जिक्र नहीं होता है। जिस तरह चीन पाकिस्तान में घुस गया है। इसको देखते हुए अमेरिका अपने को ज्यादा पाकिस्तान विरोधी नहीं दिखाना चाहता क्योंकि अमेरिका समझता है कि यदि ऐसा हुआ तो पाकिस्तान पूरी तरह चीन के साथ चला जाएगा और यदि पाकिस्तान पूरी तरह चीन के साथ चला गया तो यह अमेरिका के लिए एक बड़ी सुरक्षा समस्या होगी। इसीलिए अमेरिका पाकिस्तान को हमेशा खुश रखना चाहेगा। रूस भी यह नहीं चाहता कि पाकिस्तान पूरी तरह से चीन के साथ चला जाये।

रूस यह सोचता था कि शांति युद्ध के समय के बाद पाकिस्तान अमेरिका कि साथ ही रहेगा, लेकिन पाकिस्तान अब चीन के साथ जा रहा है। इसलिए रूस, पाकिस्तान के साथ रिश्ते बना रहा है, रूस भी यह कभी नहीं चाहेगा की पाकिस्तान पूरी तरह चीन के साथ हो जाये। मध्य एशिया कि बारे में रूस चिंतित है। रूस चाहता है कि पाकिस्तान कि साथ उसके संबन्ध मैत्रीपूर्ण रहे। क्योंकि पाकिस्तान, अमेरिका कि बारे आश्वस्त नहीं है और अगर रूस के संबन्ध पाकिस्तान से अच्छे रहते हैं तो भारत के लिये वह पाकिस्तान को कोई गंभीर समस्या उत्पन्न नहीं करने देगा।

दूसरी बात यह है कि रूस कि पास कुछ ऐसी तकनीक है जो चीन और अमेरिका के पास नहीं है। इसलिए पाकिस्तान भी रूस के साथ अच्छे संबन्ध रखने का इच्छुक है। रूस-पाकिस्तान के बीच के संबन्ध किसी भी तरह से भारत-रूस के संबन्धो पर असर नहीं डालेंगे। रूस कभी भी नहीं चाहता कि पाकिस्तान कभी भी अमेरिका और चीन के प्रभुत्व में चला जाए। इसलिए वह भारत और पाकिस्तान से अच्छे संबन्ध रखना चाहता है।

भारत की वतर्मान आर्थिक स्थिति के बारे में आपका क्या आंकलन है? ईरान-अमेरिकी तकरार से भारत पर क्या असर पड़ेगा?

भारत की आर्थिक स्थिति पर अमेरिका-ईरान के बीच चल रहे तनाव का कोई असर नहीं पड़ेगा। अमेरिका और रूस या ट्रम्प और पुतिन कि बीच गोपनीय बातचीत चल रही है। पश्चिम एशिया के बारे में, ईरान, इराक, लेबनान और अन्य देश है। उन्हें रूस और अमेरिका बाहर से ठीक रख सकते है। लेकिन उनके आंतरिक झगड़े जैसे शिया-सुन्नी लड़ाई या इस्लामिक ब्रदरहुड के साथ सुन्नी की लड़ाई, जैसे झगड़े में अमेरिका, रूस और भारत कोई कुछ नहीं कर सकता। वैसे वह शांति स्थापित करने के लिए अमेरिका और रूस दोनों राजी है।

भारत और चीन इन सबसे अलग है। मेरे विचार से युद्ध नहीं होगा। क्योंकि पुतिन और ट्रम्प दोनों युद्ध के पक्ष में नहीं है। लेकिन ईरान पश्चिमी एशिया में अमेरिका की बढ़ती दखलंदाजी के बारे में कुछ करना जरूर चाहता है। वह अमेरिका और रूस को वह आगे बढऩे नहीं देना चाहता पर भारत को ईरान और अफगानिस्तान की बीच चल रहे तनाव से कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

आप अमेरिका में रहते हैं वहाँ भारत की छवि कैसी है? क्या पिछले पांच-छह वर्षो में यह छवि बहुत अच्छी हुई है जैसा कि मोदी सरकार दावा करती है?

मोदी सरकार आने के बाद निसंदेह अमेरिका में भारत की छवि बेहतर हुई है। मूलत: अमेरिका भारत के साथ हाथ मिलाकर हिन्द महासागर में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकना चाहता है। अमेरिका की सबसे बड़ी जरुरत यह है कि भारत उसके आर्थिक और सामरिक हितो की सुरक्षा में योगदान करे। इसलिये अमेरिका को भारत का साथ चाहिये और भारत की छवि अमेरिका में बेहतर हुई है। क्योंकि मोदी सरकार भी चीन को रोककर इसमें भागीदारी करना चाहती है।

भारत के साथ अमेरिका अपने व्यापारिक संबन्ध भी सुधारना चाहता है। वह स्पष्ट है कि वह भारत के साथ कैसे व्यापारिक संबन्ध चाहता है। यह व्यापर आगे आनेवाले दिनों में बढ़ेगा यह भी संभव है कि भारत को नियंत्रित करना बहुत मुश्किल है। भारत की ईरान और रूस के साथ जो दोस्ती है उसे अमेरिका को मानना ही पड़ेगा। लेकिन भारत, चीन के खिलाफ अमेरिका के साथ हाथ मिला सकता है। अमेरिका में भारत की एक छवि यह भी है कि वह ठीक से अपना विकास नहीं कर रहा है। चीन पिछले 30-35 वर्षो में बहुत आगे बढ़ गया है। लेकिन भारत में ऐसा नहीं हुआ।

अमेरिका नहीं चाहता कि किसी भी तरह की अशांति भारत में बढ़े क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो चीन को और आगे बढऩे का मौका मिल जायेगा और चीन बांग्लादेश व भारत के अन्य पड़ोसी देशो में घुस जाएगा। अमेरिका के एशियन दोस्त सोचते हैं कि जापान, भारत और दक्षिण कोरिया एक साथ काम करे और अमेरिका भी साथ में रहे तो एशियन देश आत्मनिर्भर रह सकते है। लेकिन अगर भारत कमजोर होता है तो एशियन देश चीन के साथ चले जाएंगे और ऐसा हुआ तो अमेरिकी सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील दक्षिणी चीन के सामुद्रिक देशो जैसे ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, फिलीपीन्स, वियतनाम और मलेशिया आदि में चीन का वर्चस्व हो जायेगा। इसलिये अमेरिका दक्षिण और दक्षिणपूर्व एशिया में भारत को शक्तिशाली देखना चाहता है। #

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