भारतीय विदेश नीति : हमारी विदेश नीति कितनी सफल, कितनी असफल

 


रेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री के रूप में अपने दूसरे कार्यकाल के 6 महीने पूरे कर चुके हैं और अगले आम चुनाव के बाद यानी 2024 में नई सरकार के गठन तक उनके पास करीब साढ़े चार साल का समय बचा है, जब वो देश से लेकर दुनिया तक के पटल पर अपनी सफलता की इबारत लिख सकें, भारत को ‘विश्वगुरु’ बनाने का अपना सपना पूरा कर सकें। यह अभी तय नहीं है कि 2024 का आम चुनाव बीजेपी नरेंद्र मोदी के ही नेतृत्व में या उन्हें प्रधानमंत्री के चेहरे के रूप में पेश करके लड़ेगी क्योंकि मोदी 2025 में 75 वर्ष के हो जाएंगे और पार्टी की परंपरा और नीतियों के मुताबिक उनकी जगह तब मार्गदर्शक मंडल में ही होनी चाहिए। 

बहरहाल, अभी यह तय होने में वक्त है कि 2024 में या 2024 के आम चुनाव में मोदी की क्या भूमिका होगी। लेकिन, ये तो तय है कि 2024 से पहले या 2024 तक मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में देश में और वैश्विक नेता के रूप में दुनिया के पटल पर महत्वपूर्ण भूमिका जरूर निभानी और साबित करनी है, जिसकी उनसे अपेक्षा की जाती रही है और इसी के साथ देश और दुनिया के मंचों पर उन्हें अपनी धमक भी साबित करनी होगी ताकि इतिहास में सर्वमान्य वैश्विक व्यक्तित्व के रूप में उनकी पहचान बन सके। 2019 के आम चुनाव में बंपर बहुमत के साथ सरकार बनाकर सत्ता में आने के बाद पहले 6 महीनों में ही लिये गये अपने फैसलों से मोदी ने साबित कर दिया है कि उनका उद्देश्य पार्टी के एजेंडे को परवान चढ़ाना है। वहीं, मोदी के सामने वैश्विक स्तर पर अपने उन वादों और दावों को जमीन पर उतारने की भी चुनौतियां हैं, जिन्हें वो अपने पहले कार्यकाल के पहले दिन से ही जनता के सामने पेश करते आए हैं।   

अन्य मुद्दों का मूल्यांकन तो हो ही रहा है और होता ही रहेगा। लेकिन, फिलहाल बात मोदी की विदेश नीति की। 2019 में दोबारा सत्ता में आकर सरकार बनाने के बाद सबसे पहले विदेश के मोर्चे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीति में सबसे बड़ा बदलाव तो यही देखने को मिला कि उन्होंने किसी राजनेता की जगह एक करियर डिप्लोमेट एस जयशंकर को सीधे अपना विदेश मंत्री बना डाला, जो पहले विदेश सचिव भी रह चुके थे और विदेश मंत्रालय में अहम पदों पर काम कर चुके थे। इससे पहले, 2014 में सरकार बनाने पर मोदी ने महत्वपूर्ण विदेश मंत्रालय बीजेपी की वरिष्ठ और मुखर नेत्री सुषमा स्वराज को सौंपा था जो सोशल मीडिया के माध्यम से प्रवासी भारतीयों और विदेशी नागरिकों की भारत संबंधी मामलों में अपनी मददगार छवि के कारण काफी चर्चित रहीं। खराब स्वास्थ्य के कारण सुषमा स्वराज 2019 के मोदी मंत्रिमंडल से दूर रहीं और जल्द ही उनका निधन भी हो गया। इससे पहले, 2014 से 5 साल की मोदी सरकार में सुषमा जी के विदेश मंत्री होने के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर विदेश मंत्रालय पर हावी रहने के आरोप भी लगते रहे।

 विदेश मामलों में अतिसक्रियता के कारण मोदी की यह कहकर आलोचना की जाती रही कि उनके सामने सुषमा स्वराज का विदेश मंत्री होना बेमानी है। हालांकि, दूसरे तरीके से देखें तो मोदी प्रधानमंत्री के रूप में विदेशी मामलों में गहरी रुचि लेकर अपना काम कर रहे थे और सुषमा विदेश मंत्री के रूप में अपनी भूमिका निभा रही थी। 2014 में सत्ता में आए मोदी के एजेंडे में दुनिया के पटल पर देश के साथ-साथ अपनी और बीजेपी की छवि का भी निर्माण करना था। अमेरिका में न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डेन या फिर ऑस्ट्रेलिया के सिडनी में या अन्य देशों में प्रवासी भारतीयों की सार्वजनिक सभाओं को संबोधित करना मोदी के इसी एजेंडे का हिस्सा था, जिसे पूरा करने में वे निश्चित रूप से सफल रहे। 

मोदी का दूसरा एजेंडा विश्व के बड़े नेताओं के बीच अपनी सशक्त छवि बनाने का था। इस सिलसिले में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा से लेकर वर्तमान राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप तक से दोस्ती गांठने का उपक्रम हो या फिर रूस के राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे से मित्रता की झलक दुनिया को दिखलानी हो, या फ्रांस, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया या फिर पश्चिम एशिया के देशों के नेता हों या अफ्रीका के छोटे-छोटे देशों के राष्ट्राध्यक्ष या फिर पड़ोसी देशों के नेताओं से खुलकर मिलने की कोशिश- इसमें कोई शक नहीं कि मोदी ने 2014 से 2019 के बीच अपने पहले कार्यकाल का बखूबी उपयोग विश्व के नेताओं के बीच अपने-आप को स्थापित करने में किया, क्योंकि 2014 के पहले अमेरिका समेत दुनिया के कई प्रमुख देशों के सामने मोदी की जो छवि थी, उन्हें उसे बदलना भी था। वैसे मोदी की इस कवायद का वास्तविक प्रतिफल अलग-अलग मोर्चों पर भारत की कूटनीतिक सफलता के रूप में भी देखा जा सकता है।   

2014 से अभी तक मोदी की विदेश नीति की सबसे बड़ी सफलता तो पड़ोसी देश पाकिस्तान को वैश्विक परिदृश्य में अलग-थलग करने में ही मानी जा सकती है। ये बात और है कि पाकिस्तान एक तरफ अपनी घरेलू समस्याओं के कारण कमजोर पड़ता गया है, तो दूसरी तरफ आतंकवाद को शह देने के दाग ने भी उसकी छवि बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसका फायदा पीएम मोदी के कार्यकाल में वैश्विक मंचों पर भारत को बखूबी मिला है। पीएम मोदी की अगुवाई में भारत ने न सिर्फ वैश्विक मंचों पर पाकिस्तान को कठघरे में खड़ा करने और उसके खिलाफ माहौल बनाने में कामयाबी हासिल की, बल्कि पाकिस्तान में पनाह पाये आतंकियों के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक जैसी कार्रवाइयां करने पर भी भारत के खिलाफ किसी देश ने चूं तक नहीं की। 

यही नहीं, अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को हटाकर जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेशों में बदलने के मोदी सरकार के फैसले की भी कहीं से आलोचना नहीं सुनाई पड़ी, जबकि पाकिस्तान बार-बार इस पर अपनी बौखलाहट जाहिर करता रहा। वैश्विक मंचों पर पाकिस्तान की आवाज सुने नहीं जाने की एक वजह तो यह भी हो सकती है कि अमेरिका जैसे देशों ने यह समझ लिया कि पाकिस्तान को मोदी के दमदार नेतृत्व वाला भारत ही सबक सिखा सकता है, और प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में अब तक बखूबी इस तरह की कार्रवाई को अंजाम दिया गया है। ये भी अभूतपूर्व स्थिति है कि इस्लामी राष्ट्र होने के बावजूद हालिया वर्षों में पाकिस्तान को खाड़ी और पश्चिम एशिया के मुल्कों में भी वो इज्जत नहीं मिली, जो भारत के प्रधानमंत्री मोदी को मिली। 

रही बात चीन की, तो इसमें कोई दो-राय नहीं कि हर तरह से मजबूत पड़ोसी चीन से निपटना भारत के लिए मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। लेकिन, उसे काबू में रखने की कोशिशें लगातार रंग लाती दिख रही हैं। मोदी के कार्यकाल में चीन न सिर्फ कैलाश-मानसरोवर के लिए वैकल्पिक रास्ता खोलने पर राजी हुआ बल्कि सीमा विवाद से जुड़े मामले भी अब काफी हद तक ठंडे दिख रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी की चीन यात्राओं और चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग के भारत दौरों के बीच कहीं न कहीं यह कोशिश तो जरूर रंग लाती दिख रही है कि दोनों देश व्यापारिक हितों पर आगे बढ़ें ना कि विवादों को बढ़ावा देकर दूरी बनाएं। हालांकि, पाकिस्तान से दांत-काटी रोटी होने के कारण वैश्विक आतंकवादी मसूद अजहर के खिलाफ प्रस्ताव के मामले को चीन हमेशा संयुक्त राष्ट्र में रोकता आया है और साथ ही, भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनने देने के भी वो खिलाफ रहा है। ऐसे में, चीन के मामले में मोदी की विदेश नीति का कोई बड़ा फायदा मिला हो, ऐसा नहीं दिखता। माना जाना चाहिए कि पीएम मोदी ने चीन के मामले में भारत की विनम्रता की नीति को ही आगे बढ़ाया है, क्योंकि इसके अलावा और कोई चारा भी नहीं है। 

विदेश नीति के जानकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति का जिक्र करते हैं। और ये सच भी है कि पाकिस्तान को छोड़कर तकरीबन हर पड़ोसी देश की ओर पीएम मोदी ने दोस्ती का हाथ बढ़ाया जिसके सकारात्मक नतीजे भविष्य में कूटनीतिक मोर्चों पर दिख सकते हैं। अपने पहले शपथ ग्रहण में पीएम मोदी ने सार्क देशों के राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित किया था, तो दूसरे कार्यकाल में बिम्स्टेक देशों के राष्ट्राध्यक्ष अतिथि बने। मोदी की ‘पड़ोसी पहले’ की नीति की कामयाबी श्रीलंका के मामले में देखी जा सकती है। श्रीलंका की सत्ता में आए राजपक्षे बंधुओं को वैसे तो चीन का करीबी माना जाता था, लेकिन सत्तारूढ़ होने के बाद हंबनटोटा बंदरगाह पर राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे की प्रतिक्रिया से स्पष्ट हो गया कि श्रीलंका अपनी संप्रभुता को चीन का गुलाम नहीं बनाएगा। वहीं, गोटाबाया राजपक्षे ने सत्ता संभालने के बाद पहली विदेश यात्रा भारत की ही की। इससे साफ है कि श्रीलंका नहीं चाहता, भारत से उसके रिश्ते खराब हों, बल्कि कहें तो, आशंकाओं को दरकिनार करते हुए राजपक्षे बंधुओं की सरकार ने भारत से संबंधों के मामले में नई शुरुआत की है। वहीं, नेपाल में भी चीनियों की बदमाशियों को कबूल नहीं किये जाने की खबरें हैं, जो भारत के लिए शुभ संकेत है।   

मोदी की विदेश नीति का सबसे अहम हिस्सा अमेरिका और रूस के साथ संबंधों का है। कहना न होगा कि प्रधानमंत्री मोदी ने न सिर्फ पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ दोस्ताना शुरू किया बल्कि उनके बाद सत्ता में आए उनके धुर विरोधी डॉनल्ड ट्रंप के साथ भी दोस्ती का नया अध्याय दुनिया के सामने पेश किया। हालांकि, अमेरिका के साथ संबंधों के मामले में मोदी की तुलना पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह से की जाती है जिनके कार्यकाल में भारत और अमेरिका के बीच एटमी समझौते को अंजाम दिया गया था। ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति से भारत को कोई फायदा तो नहीं दिखता, लेकिन इसमें शक नहीं कि ट्रंप ने भी मोदी की दमदार शख्सियत को पहचाना और उनके साथ बेहतरी से पेश आने में ही अपनी भलाई समझी है, क्योंकि मोदी का दम अमेरिका में बसे उन तमाम हिंदुस्तानियों से है, जो ट्रंप के वोटर हैं। ऐसे में ट्रंप भले ही ‘अमेरिका फर्स्ट’ या अमेरिका के हित की सोचें, लेकिन, संयुक्त राष्ट्र या अन्य वैश्विक मंचों पर आतंकवाद जैसे मामलों में भारत का साथ देना उनकी मजबूरी भी है। ये पीएम मोदी की विदेश नीति का ही नतीजा है कि अमेरिका किसी भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान के मुकाबले भारत को ही तरजीह देता है। 

बात रूस की करें, तो 70 साल के भारत-रूस संबंधों में मोदी सरकार के कार्यकाल के दौरान दोनों सरकारों के बीच अब रिश्तों में नई गरमाहट आने के संकेत जरूर मिल रहे हैं। S-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम के सौदे के जरिए रूस के साथ नए सिरे से सामरिक संबंधों को बढ़ावा मिला है। इसके अलावा, ब्रिक्स समेत अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी भारत को रूस का साथ मिलने के संकेत हैं।    

कहना न होगा कि प्रधानमंत्री मोदी ने अपने कार्यकाल में दुनिया के तमाम, बड़े से बड़े और छोटे से छोटे देशों के साथ रिश्तों को नया आयाम देने का प्रयास किया है। 2014 से अभी तक के अपने कार्यकाल में मोदी ने दुनिया के तमाम देशों के दौरे किये हैं और बहुत संभव है कि वो जल्द ही भारत के इतिहास में सबसे ज्यादा विदेश यात्रा करनेवाले नेता के रूप में उनका नाम दर्ज हो जाए। विदेश दौरों को लेकर मोदी की आलोचना भी कम नहीं हुई। लेकिन, ये भी ख्याल रखना होगा कि मोदी ने कई बार कम-से-कम समय में ज्यादा-से-ज्यादा देशों का सफर करने का कार्यक्रम बनाया जिसका मकसद कूटनीतिक रिश्तों को मजबूती देना ही रहा है। और इसमें वो सफल भी हुए हैं। भारत-विद्या योग को दुनिया के कोने-कोने में लोकप्रिय बनाने के लिए हर साल 21 जून को दुनियाभर के देशों में ‘विश्व योग दिवस’ मनाने के संकल्प का संयुक्त राष्ट्र में अनुमोदन और स्वीकरण इसका ज्वलंत प्रमाण है।  

मोदी की विदेश नीति की विफलता इस मायने में जरूर कही जा सकती है कि विदेशों से प्रचुर मात्रा में निवेश भारत में अब तक नहीं आ सका है, जिसकी अपेक्षा थी। न तो ‘मेक इन इंडिया’ योजना में दुनिया के बहुत-से देशों ने दिलचस्पी दिखाई और ना ही मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट ‘स्मार्ट सिटी’ में विदेशों की खास भागीदारी दिखी है। जापान ने मोदी की बुलेट ट्रेन परियोजना को सहारा जरूर दिया था लेकिन महाराष्ट्र में सरकार बदलने के बाद ये सपना भी घरेलू उलझनों का शिकार होता दिख रहा है। ऐसे में भारत को 2024 तक 5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बनाने का मोदी सरकार का सपना पूरा होना मुश्किल ही लगता है। एक ब्रिटिश संस्था सेंटर फॉर इकॉनॉमिक्स एंड बिजनेस रिसर्च ने अपनी रिपोर्ट में संभावना जताई है कि भारत यह लक्ष्य 2026 तक हासिल कर सकता है। यानी मोदी सरकार का लक्ष्य 2024 तक पूरा होने की संभावना नहीं है। हालांकि, अभी भी पीएम मोदी के पास कम से कम साढ़े साल बचे हैं, जिनका सदुपयोग हो, तो विदेशों से रिश्ते और बुलंदियों पर पहुंचाए जा सकते हैं और हर वो लक्ष्य तय समय में पूरा हो सकता है जिसकी सरकार को दरकार है। #

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