आर्थिक जगत : केंद्रीय बजट से आर्थिक स्थित में सुधार की अपेक्षा

 

जट सरकार की आय और व्यय का लेखा मात्र नहीं होता अर्थव्यवस्था की दशा और दिशा की भी प्रतिबंबित करता है। वर्ष 2020-21 का भारत सरकार का बजट ऐसे समय पर आ रहा है जब अर्थव्यवस्था ढलान पर है और जीडीपी का विकास दर पिछली तिमाही में 4.5 प्रतिशत पर आ गया है कि जो पिछले 8 वर्षों का सबसे कम है। दिसंबर महीने में खुदरा महंगाई 7.5 प्रतिशत रही जो पिछले 6 वर्षों में सबसे अधिक है। बेरोजगारी चरम सीमा पर है जो कि चार दशकों में सबसे अधिक है। लघु और मध्यम श्रेणी के उद्योग चीन से आयात माल के कारण संकट से जूझ रहे हैं। किसानों को उत्पादन की पूरी लागत नहीं मिल पा रही है। असंगठित क्षेत्र के मजदूरों में भी बेकारी बढ़ी है। बेलगाम तेजी से बढ़ती आबादी के कारण प्राकृतिक संसाधनों का दोहन भी अत्यधिक मात्रा में हो रहा है जो कि चिंता का कारण है।

विमुद्रीकरण का प्रभाव अभी भी अर्थव्यवस्था को उपर उठने नहीं दे रहा है। बाजार में नकदी की कमी है। चीजों की मांग में गिरावट के कारण बड़े उद्योग भी प्रभावित हुए हैं, उनका विकास दर पिछले वर्षो की अपेक्षा बहुत कम है। आयकर और जीएसटी उगाही अनुमान से कम होने से सरकार की योजनाओं पर खर्च की क्षमता घटी है। इसका प्रभाव वित्तीय घाटा पर भी पड़ रहा है जिसके बढऩे की संभावना है। विदेशी निवेश बढ़ा है किंतु स्वदेशी निवेश रिजर्व बैंक द्वारा कई बार रैपो रेट में कमी के बावजूद बढ़ नहीं रहा है शेयर बाजार उछाल पर रहा है जो कि पूंजी बाजार की मजबूती अवश्य दिखाता है और अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत है। विदेशी मुद्रा के भंडारण में बढ़ोतरी हुई है।

ग्रामीण विकास सरकार की प्राथमिकता होना चाहिए। खेती के प्रति दिनोंदिन उदासीनता बढ़ती जा रही है क्योंकि एक ओर किसान को पूरा लागत नहीं मिल पाता तो दूसरी ओर बाढ़, सूखा, बर्फबारी, मौसम से असमय परिवर्तन और अन्य प्राकृतिक आपदाएं भी उसे झेलनी पड़ती है। पिछले कुछ वर्षों में गांवों में सड़कों का निर्माण तेजी से हुआ है, सरकार की ओर से पक्के घरों की व्यवस्था भी हो रही है, बिजली अधिकांश गांव में आ गई है, धुएं के चूल्हे से महिलाओं को मुक्ति मिल रही है और टॉयलेट जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध होने लगी है किंतु प्राइमरी शिक्षा और स्वास्थ्य पर उतना ध्यान नहीं दिया गया जितना की अपेक्षित है।

मंडियों में किसान का धक्के खाते रहना आम बात है। किसानों के कर्ज माफी के वायदे कई राज्यों में अभी भी कागज पर ही है। किसान सम्मान निधि का लाभ भी अफसरशाही के चलते बहुत से किसानों को नहीं मिल पा रहा है। सिंचाई के साधन अभी बहुत से क्षेत्रों में सीमित है। कुछ राज्यों में फर्टिलाइजर की उपलब्धता पर भी सवाल उठे हैं। बजट का बड़ा हिस्सा गांव पर खर्च होना चाहिए। औद्योगिक और उपभोक्ता पदार्थों की मांग में कमी आई है इसके लिए भी आवश्यक है गांव में लोगों की माली हालत में तेजी से सुधार हो।

छोटे उद्योगों को बिना जमानत और आसानी से कर्ज की सुविधा का जो वादा सरकार करती है वे धरातल पर प्रभावी नहीं दिखती है। बड़े उद्योगपति बैंकों और वित्तीय संस्थानों से करोड़ों का लोन आसानी से पा जाते हैं जबकि छोटे उद्योग और व्यापारियों को इसके लिए चक्कर लगाने पड़ते हैं। जीएसटी जमा करने और रिफंड के प्रोविजन भी सबसे ज्यादा दुखदाई छोटे व्यापारियों और उद्योगपतियों के लिए ही है। सरकार इस क्षेत्र के प्रति उदासीन रही है बजट में लघु और मध्यम उद्योगों तथा व्यापारियों के हितों का ध्यान रखते हुए धन के आवंटन में वृद्धि की जानी चाहिए। उद्योगों के पुनरुत्थान और बीमार पड़े उद्योगों के लिए अनुदान और ऋण की व्यवस्था की जानी चाहिए। इन उद्योगों के आधुनिकीकरण और इनसे निर्यात होने वाले पदार्थों पर प्रोत्साहन रकम बढ़ाई जाए।

बड़े उद्योगों को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार ने कारपोरेट टैक्स 30 से 22 प्रतिशत कर दिया है। नए मैन्युफैक्चरर्स को भी छूट दी गई है। रिजर्व बैंक ने पिछले कुछ महीनों में 13 पॉइंट की कमी कर दी गई है। किंतु इसका लाभ अधिकांश बैंकों में निवेशकों को नहीं मिला जिससे रिजर्व बैंक की छूट बहुत कारगर साबित नहीं हुई है। खुदरा महंगाई में पिछले महीनों में जो वृद्धि हुए उससे रिजर्व बैंक के लिए रैपो रेट में कमी की संभावना घट रही है। सरकार भी रिजर्व बैंक से और अधिक डिविडेंड की अपेक्षा कर रही है। क्योंकि टैक्सों में उगाही गिरने से उसकी खर्च करने की क्षमता घट रही है। ऐसी स्थिति में वित्तमंत्री के सामने बड़ी चुनौतियां हैं जैसे उद्योगों की मांग, खेती और लघु उद्योगों के लिए अधिक आवंटन, सरकारी प्रोजेक्टस के खर्च के प्रावधान की व्यवस्था करना। इंफ्रास्ट्रक्चर पर अगले पांच वर्षों में सरकार ने 100 लाख करोड रुपए खर्च करने का वादा पहले ही कर दिया है जो आवश्यक भी है। शिक्षा और स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च इस देश में विकसित देशों की अपेक्षा बहुत ही कम है। सरकार यदि नई शिक्षा नीति को कार्यान्वित करना चाहती और आयुष्मान भारत का 50 करोड़ लोगों तक पहुंचाना चाहती है तो बजट में इनके लिए भारी प्रावधान की आवश्यकता होगी।

आयकर की पिछले वर्ष सरकार ने कमी की थी इस वर्ष और छूट की संभावना कम है। किंतु चीजों की गिरती मांग और बढ़ती महंगाई के कारण मध्यमवर्ग आयकर में कमी की अपेक्षा कर रहा है। निवेश पर मिलने वाली छूट जो कई वर्षों से 1.5 लाख रुपए पर अटकी हुई है उसे बढ़ाने का औचित्य इस गिरती अर्थव्यवस्था में अधिक है। इससे बचत और निवेश दोनों में बढ़ोतरी होगी। छोटे और मध्यम उद्योगपतियों, व्यापारियों, नौकरीपेशा में लगे लोगों और आम जनता को इसका लाभ होगा। इंफ्रास्ट्रक्चर के अलावा सरकार की अन्य बहुत सी योजनाओं का क्रियान्वयन उस गति से नहीं हो रहा है जो अपेक्षित है। सरकारी अनुदान की कमी और प्रशासन की कमजोरियों से यह स्थिति बनी हुई है। अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए सरकार को इन योजनाओं के लिए अधिक धन आवंटन करना होगा।

विभिन्न क्षेत्रों में बढ़ती मांग के कारण सरकारी खर्च में आय की अपेक्षा अधिक वृद्धि संभावित है जिसका परिणाम वित्तीय घाटे पर पड़ेगा। रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर का मानना है कि सरकारी घाटे में कुछ वृद्धि के डर से सरकार विकास के कार्यों को धन की कमी से ना रोके। सरकार को चाहिए कि कम आमदनी के लोगों के पास अधिक रकम आए ताकि उनकी क्रम शक्ति बढ़े। नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी का मानना है कि सरकार वित्तीय घाटे की निर्धारित सीमा पहले ही तोड़ चुकी है जो इस फिस्कल रिस्पोंसबिल्टी एंड मैनेजमेंट एक्ट में दी गई है। एक्ट के अनुसार 50 बेसिक प्वाइंट या 0.5 प्रतिशत तक सरकार स्लिप कर सकती है जो आय की आर्थिक स्थिति में उसे करना चाहिए। ऐसा अनुमान है कि आय में कमी और खर्च वृद्धि के कारण वर्ष 2020 का घाटा 3.5 से 3.8 प्रतिशत तक जा सकता है। विकास की प्राथमिकता को देखते हुए सरकार यह खतरा मोल ले सकती है। इंदिरा गांधी के बाद निर्मला सीतारमन दूसरी महिला वित्तमंत्री है जो इस वर्ष का नया बजट पेश करेगीं। आशा है कि अर्थव्यवस्था के सामने जो चुनौतियां हैं उनका सफलतापूर्वक सामना करेगीं और मंदी की स्थिति से ऊपर ले जाएगीं। #

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