मीडिया मंथन : अंतर्राष्ट्रीय घटनाचक्र और भारतीय मीडिया

 

मीडिया अथवा माध्यम की भूमिका जितनी निष्पक्ष होगी उतनी ही जनता को घटनाओं को समझने मे आसानी होगी। लेकिन जनवरी 2020 की शुरुआत ऐसी हुई है की विश्व की तीन बड़ी घटनाओं के बारे मे भारत ही नही दुनियाभर के टेलीविजन, इंटरनेट चैनलो और अख़बारों मे स्पष्ट रूप से न ही चर्चा हुई और न ही विश्लेषण पढऩे को मिले। यह तीन बड़ी घटनाएं थी, ईरान-अमेरिका में सघर्ष की स्थिति, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प की खिलाफ महाअभियोग की शुरआत और रूस मे राजनीतिक उथल-पुथल। इनके कवरेज मे भारत की मीडिया, प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक, दोनो की भूमिका सबसे अधिक कमजोर या अपर्याप्त रही है।

ईरान-अमेरिका के बीच तनाव का कारण बग़दाद में हुई ईरानी जनरल सुलेमानी की हत्या को माना जाता है। सुलेमानी, जो कभी अमेरिका का खास समर्थक था, अमेरिकी ड्रोन के हमले से मारा गया, किंतु यह नही बताया गया कि इराक़ और सीरिया मे सुन्नी मुसलमानो की विश्वविजय की कामना करने वाले आईएसआईएस के खिलाफ अमेरिका का साथ देने वाला सुलेमानी अमेरिका का दुश्मन कब और कैसे हो गया। क्या शिया ईरान से झगड़ा बढ़ाने के उद्देश्य से ही अमेरिका ने सुलेमानी का वधकर दिया या यह भी संभव है कि सुलेमानी को सिर्फ़ ट्रम्प को 2020 के राष्ट्रपति चुनाव मे जितवाने के लिए मार दिया गया। इस घटना की तुलना ओसामा बिन लादेन से करना उचित नही है, क्योंकि सुलेमानी कोई फरार आतकी नहीं था। इराक में उसकी उपस्थिति अमेरिका की जानकारी में थी।

ईरान का तथाकथित बदला और अमेरिकी अड्डों पर मिसाइल हमलो के बीच यूक्रेन के विमान में 176 यात्रियों की मौत, जिसमें 50 से अधिक ईरानी परिवारो के सदस्य थे, अमेरिका-ईरान संघर्ष सिर्फ़ मौत का तांडव  बनकर रह गया। लेकिन यह कहना कठिन है कि सुलेमानी की मौत का फायदा ट्रम्प ले पाएंगे, जैसे कि ओबामा को ओसामा की मौत का हुआ था। ओबामा आसानी से दोबारा अमेरिकी राष्ट्रपति चुन लिए गए थे। इस पर विस्तार से चर्चा की आवश्यकता है। ईरान के विदेशमंत्री जवाद जऱीफ़ की जनवरी 2020 में भारत यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से क्षेत्र में तनाव घटाने में सक्रिय भूमिका की अपील को लेकर भी भारत का मीडिया खामोश दिखता है। भारत की कोई भूमिका क्या ऐसे वक्त में हो सकती है जब ईरान के शासको की धर्म की आड़े में चल रहे अधिनायकवादी शासन के खिलाफ जन आक्रोश उभर रहा है। मीडिया में इसकी भी चर्चा होनी चाहिए।

ईरानी धार्मिक कट्टरपंथी शासको के खिलाफ आम जनता में भी काफ़ी रोष है। आज इन सब घटनाओं पर जितनी चर्चा अंग्रेज़ी के तथाकथित राष्ट्रीय अख़बारो में इधर दिखाई पड़ी है, उससे कहीं अधिक इन विषयों पर कवरेज पिछली सदी मे राज्यों में छपने वाले हिन्दी और दूसरी भाषाओ के पत्रों में होती थी। आज मीडिया ने इस पर भी गौर नही किया कि भारत के तमाम लोग खाड़ी के देशो में काम करते हैं या व्यापार। इन घटनाओ का भारत पर कितना असर पड सकता है, लगता है कि मीडिया का इससे कोई सरोकार नही है।

बेख़ौफ़  ट्रम्प

इधर ईरान का मामला ठंडा भी नहीं हुआ कि महाअभियोग की सुनवाई अमेरिका के उच्च सदन, सेनेट में शुरू हो गई। तमाम लोग जिन्हें इन घटनाओ मे रुचि थी, उन्हें भारत की मीडिया से अपेक्षित जानकारी नहीं मिल सकी है। मीडिया को इस बात की परवाह नही है कि भारतीयों के कितने हित आज अमेरिका से जुड़े है।

सेनेट में इधर सुनवाई हो रही थी, उधर ट्रम्प लंबा चौड़ा भाषण दे रहे थे, जैसे उन्हें महाअभियोग की कोई परवाह नही है। ट्रम्प और चीन के उपराष्ट्रपति के बीच व्यापार समझौते के अवसर पर ट्रम्प भाषण दे रहे थे। इससे यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि मीडिया और जन प्रतिनिधियो की भूमिकाएं पहली जैसी नही रही हैं।

लोकतंत्र को बचाने के लिए समुचित कदम उठाने की आवश्यकता है। इसमे मीडिया को सुधारने की ज़रूरत पहले है। मीडिया की सतर्क होने पर लोक प्रतिनिधि भी सुधरने लगेंगे। इन घटनाओ ने यह साबित कर दिया कि मीडिया सिर्फ़ ढिढोरा पीटने वाला बनकर रह गया है। इस छवि को बदलने की जरुरत है।

 

ट्रम् के राज मे ठगों का बोलबाला

अगर आपके आसपास अपराधी और बदनाम किस्म के लोग हों तो आप उनका मज़े से इस्तेमाल का सकते हैं और जब आपके फसने की नौबत की नौबत आ जाए तो यह कहकर पीछा छुड़ा सकते हैं कि इनकी बात का क्या यकीन करना यह तो अपराधी हैं या अपराधी प्रवृति के हैं। लेव परनास, जिसने यूक्रेन सरकार को ट्रम्प के नाम पर पूर्व उपराष्ट्रपति बिडेन और उनके बेटे हंटर के खिलाफ जाँच का दबाव डाला था, उससे ट्रम्प प्रशासन ने नाता तोड़ लिया है, जब कि परनास ट्रम्प के वकील गुलियानी को लगातार मोटी रकम देता रहा है। ट्रम्प के सहयोगी यह कहकर बचना चाह रहे हैं कि इसका क्या यकीन करना। यह पुराना अपराधी है।

परनास की कंपनी को आमतौर पर फ्राड कंपनी कहा जाता है। इसी तरह मिशेल कोहेन, जो कि ट्रम् के वकील रह चुके हैं, ट्रम्प समर्थक उसे जाति या नस्लवादी और यहां तक कि उसे धोखेबाज कहकर उसको अविश्वसनीय तक कह रहे है। लेकिन यह भी सच है कि ट्रम्प के वकील गुलियानी पर खुद अमेरिका की संघीय एजेन्सी अपराधिक मामलो की जाँच कर रही है। अब तो ट्रम् की पार्टी रिपब्लिकेन के सदस्यो को तय करना है कि ट्रम्प और उसके प्रशासन के आपराधिक चरित्र को चलने देना है या ट्रम्प को सत्ता के बाहर करना है।

 

रूस की घटनाएं

रूस की घटनाओ की चर्चा ज़रूरी है। इससे शुरुआत करते हैं। कारण यह है कि आज भी सामरिक दृष्टि रूस भारत के लिए महत्वपूर्ण है। रूसी राष्ट्रपति येल्टसिन के दौरान, पुतिन खुफिय़ा एजेन्सी, केजीबी, छोड़कर राजनीति मे आए थे और पिछले बीस वर्षों से रूस की राजनीति पर छाए हुए हैं। व्लादिमीर पुतिन ने रूसी संविधान मे बदलाव को लेकर जो पहल की है उसकी इंग्लैंड और अमेरिका के अख़बारों मे गरमा-गरम चर्चाएं हो रही  हैं।

इनका कहना है कि वर्ष 2024 के बाद भी पुतिन सत्ता में बने रहने का जुगाड़ कर रहे हैं। भारत के मीडिया में इन राजनीतिक भारी उलटफेर का भारत पर क्या असर पड़ेगा, उसकी कोई चर्चा नहीं हो रही है। भारत में सिर्फ़ खबर बताई गई, इस परिवर्तन का भारत और उसके आसपास के क्षेत्रों पर पडने वाले असर भारत की कोई जानकारी नही दी गई।

पुतिन पर आरोप है कि वह यूरोप और अमेरिका की राजनीति में दखल देते रहे हैं। इसका उल्लेख ट्रम् के खिलाफ महाभियोग में भी हुआ है। भारत को कभी भी पुतिन प्रशासन से कोई शिकायत नहीं रही है। किंतु यह भी सही है कि पुतिन ने चीन को साईबेरिया में घुसने की खुली छूट दे दी है और पेट्रोल सप्लाई करने के लिए सैकड़ो किलोमीटर लंबी पाइप लाइन बिछाकर चीन की अर्थव्यवस्था को ताकत दी है। रूस में सत्ता के नए समीकरण बन रहे हैं।

भारत के न्यूज़ चैनलो ओर अख़बारों में इसकी विस्तार से चर्चा होनी चाहिए। मीडिया को अपनी नीति बदलनी चाहिए। आजकल विश्व घटनाओं की न तो चर्चा होती है ओर न ही उस पर कोई टीका टिप्पणी। दर्शक या पाठक इन घटनाओ के बारे में न तो समझ पाते हैं और न ही उन पर कोई राय बना सकते हैं। इस मामले में अंगेजी और अन्य पत्र बराबर के दोषी हैं। #

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