अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य : सियासत की पिच पर फिसड्डी “कप्तान”


वर्ष 1971 से 1992 के बीच तकरीबन 20 साल तक पाकिस्तान के लिए खेलकर क्रिकेट की दुनिया में बेहतरीन मुकाम बनाने वाले इमरान खान नियाजी ने सियासत की पिच पर 12 साल प्रैक्टिस के बाद 2018 में जब प्रधानमंत्री के रूप में पाकिस्तान की कमान संभाली थी तो ऐसा लगा था उनकी सरपरस्ती में पड़ोसी देश का चेहरा बदलेगा। खुद इमरान खान ने भी बार-बार अपने भाषणों में नया पाकिस्तान बनाने का वादा किया था जिसमें भ्रष्टाचार नहीं होगा और मुफलिसी के हालात से देश को मुक्ति मिलेगी। हालांकि भारत के मोर्चे पर पाकिस्तान के रूख में न पहले किसी तब्दीली की उम्मीद थी और ना ही इमरान खान के सत्ता में आने के बाद इसमें किसी बदलाव की सूरत दिखनेवाली थी, क्योंकि इमरान भी आखिरकार सेना और कट्टरपंथियों के उसी कुनबे का आशीर्वाद हासिल करके प्रधानमंत्री बने थे जिसके लिए कश्मीर का मुद्दा एक दहकता हुआ नासूर है और भारत दुश्मन ही था, दुश्मन ही रहेगा। लेकिन, कम से कम मुशर्रफ, जरदारी और नवाज शरीफ की सरपरस्ती में बर्बाद हुए पाकिस्तान के हालात में कुछ सुधार होगा, इसकी उम्मीद तो जरूर थी। लेकिन, स्थिति ये है कि इमरान खान की सरकार के करीब सवा साल बीतने को आए, लेकिन हालात वहां और बिगड़ते ही नज़र आ रहे हैं। दुनिया की तमाम अमनपसंद ताकतें पाकिस्तान से किनारा कर रही हैं। इनमें नया नाम ऑस्ट्रेलिया का है जिसने पिछले दिनों पाकिस्तान को दी जाने वाली मदद पर रोक लगाने का फैसला किया। 

आपको बता दें, ऑस्ट्रेलिया पिछले 70 साल से यानी पाकिस्तान बनने के 2 साल बाद से ही उसकी मदद करता आ रहा है। ऑस्ट्रेलिया की ओर पाकिस्तान में कल्याणकारी योजनाओं, खासकर महिलाओं की मदद के लिए मोटी रकम मिलती रही है। ऑस्ट्रेलिया ने 2018-19 के लिए पाकिस्तान को 3.9 करोड़ डॉलर की मदद दी थी, लेकिन साल 2019-20 में इसे घटाकर 1.9 करोड़ डॉलर कर दिया। और अब साल 2020-21 से ये मदद पूरी तरह ख़त्म कर दी जाएगी। बताया जा रहा है कि ऑस्ट्रेलिया अब ये रकम प्रशांत क्षेत्र में नए प्रोजेक्ट पर ख़र्च करेगा। हालांकि, ऑस्ट्रेलिया की ओर से मदद रोकने की वजह पाकिस्तान से चीन की गहरी दोस्ती है। ऑस्ट्रेलिया के आसपास के क्षेत्रों में चीन का असर बढ़ रहा है और ऑस्ट्रेलिया को ये बात पसंद नहीं आ रही है। लेकिन, परेशानी तो पाकिस्तान की बढ़नेवाली है।

इससे पहले, अमेरिका की ओर से पाकिस्तान को झटके लगते ही रहे हैं। अगस्त में ही अमेरिका ने पाकिस्तान को केरी लूगर बर्मन एक्ट के तहत दी जानेवाली आर्थिक मदद में 44 करोड़ डॉलर की कटौती करने का एलान किया था। इस एक्ट के तहत पाकिस्तान को “पाकिस्तान एन्हैंस्ड पार्टनरशिप एग्रीमेंट –पेपा 2010” के जरिए मदद दी जाती है। अमेरिकी कांग्रेस ने अक्टूबर 2009 में अमेरिकी कांग्रेस ने केरी लूगर बर्मन एक्ट पास किया था जिसके तहत पाकिस्तान को ऊर्जा और जल संकट दूर करने के लिए मदद मिलती थी। यही नहीं, अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप कई बार पाकिस्तान की आलोचना करते हुए यह कह चुके हैं कि अमेरिका ने पाकिस्तान को जितना धन दिया है, उसके बदले पाकिस्तान ने अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा नहीं किया। ट्रंप का कहना था कि अमेरिकी सरकारों ने पाकिस्ता न को बीते 15 वर्षों में 33 बिलियन डॉलर की राशि दी, इसके बाद भी अमेरिका को कुछ नहीं मिला और पाकिस्तान झूठ बोलता रहा। ट्रंप ने सत्ता में आने के बाद 2018 में पाकिस्ता न को दी जाने वाली 1.3 बिलियन डॉलर की आर्थिक मदद मदद को रोक दिया था। तो अमेरिका की ओर से पाकिस्तान को अच्छी मदद जारी रहने की संभावना कम ही है।

रही बात चीन की, तो चीन ही एक ऐसा देश है, जो लगातार पाकिस्तान को आर्थिक मोर्चे पर सहारा देता रहा है। पिछले दिनों एक बार फिर चीन ने पाकिस्तान को 2.2 अरब डॉलर की मदद दी ताकि उसके विदेशी मुद्रा भंडार की स्थिति ठीक हो सके और वो अपने विदेशी कर्जों का भुगतान कर सके। रिपोर्ट्स की मानें तो इमरान खान के सत्ता में आने के बाद पाकिस्तान ने पहली बार 1 साल के अंदर 16 अरब डॉलर का विदेशी कर्ज लेकर नया इतिहास रच दिया। इससे पहले जुलाई 2018 में पाकिस्तान ने 2.4 अरब डॉलर का विदेशी कर्ज लिया था। कुल मिलाकर पाकिस्तान का विदेशी कर्ज अब 90 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है और उसके बजट का 42 फीसदी हिस्सा तो कर्ज चुकाने में ही हजम हो जाता है। पाकिस्तानी अखबारों के मुताबिक, पाकिस्तान चालू वित्त वर्ष में सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे अपने मित्र देशों से 9.1 अरब डॉलर की आर्थिक मदद हासिल कर चुका है।

पिछले दिनों विश्व बैंक ने भी कहा था कि पाकिस्तान की आर्थिक सेहत बहुत ख़राब है। विश्व बैंक ने अपनी रिपोर्ट मे कहा था कि खराब आर्थिक नीतियों की वजह से पाकिस्तान कर्ज में डूबता जा रहा है और बढ़ते राजकोषिय घाटे के चलते अर्थव्यवस्था चरमरा रही है। विश्व बैंक ने कहा था कि इस स्थिति में 2020 में पाकिस्तान की विकास दर घट कर 2.4 फीसदी के स्तर तक आ सकती है और महंगाई 13 फीसदी से ऊपर जा सकती है।

कुल मिलाकर स्थिति यही है कि इमरान खान की सरकार आर्थिक मोर्चे पर बहुत ही बुरी स्थिति से जूझ रही है। भले ही इमरान को खराब माली हालत विरासत में मिली हो, लेकिन उसे सुधारने की दिशा में भी वो कुछ नहीं कर सके। आलम ये है कि पाकिस्तान में महंगाई चरम पर है और सरकार के खर्चे चलाने के लिए सरकारी कारें गधे और भैंसें बेचने जैसी हास्यास्पद खबरें भी अक्सर मीडिया में आती रहती हैं।

ऐसी स्थिति इसलिए है कि इमरान खान की सरकार आतंकवादियों पर लगाम लगाने की दिशा में कोई भी ठोस कदम नहीं उठा सकी है। भारत के खिलाफ दुष्प्रचार और लॉबीइंग करने में अपना वक्त जाया कर रहे इमरान अपने देश की अंदरूनी स्थिति पर ध्यान दे ही नहीं पा रहे। इसका नतीजा ये है कि इमरान की सरकार पर अस्थिरता के बादल मंडराने लगे हैं और हाल के दिनों में कई बार अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में पाकिस्तान में सेना के सत्ता पर कब्जे और तख्तापलट की आशंकाएं जाहिर की जा चुकी हैं। पाकिस्तानी सेना पर इमरान सरकार की बढ़ती निर्भरता का ही एक बड़ा सबूत है पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष पद पर वहां के ताकतवर जरनल कमर जावेद बाजवा का कार्यकाल बढ़ाये जाने की कवायद। 

पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख दिखाते हुए बाजवा का कार्यकाल 3 साल बढ़ाने पर रोक लगा दी। लेकिन इमरान खान की सरकार कानून बदलकर भी किसी भी तरह से अपने फैसले को अमल में लाने पर आमादा दिखती है। लिहाजा ऐसा लग रहा है कि कहीं इमरान खान पाकिस्तानी सेना की कठपुतली बनकर तो नहीं रह गये हैं। ऐसा इसलिए भी लग रहा है क्योंकि पिछले दिनों सिखों के धर्मस्थल करतारपुर की यात्रा के लिए कॉरिडोर बनाने के फैसले पर भी जनरल बाजवा की छाया दिखी। इसका मकसद कॉरिडोर का इस्तेमाल भारत में सिख आतंकवाद और चोरी छुपे घुसपैठ को बढ़ावा देना बताया गया। 

हालांकि बाजवा ने 9 नवंबर को करतारपुर कॉरिडोर के उद्धाटन से दूरी ही बनाये रखी। लेकिन, कहीं न कहीं ऐसा जरूर लग रहा है कि इमरान खान जो भी कर रहे हैं वो सेना और आईएसआई के इशारे पर ही कर रहे हैं। ऐसा होना लाजिमी भी है क्योंकि इमरान के सिपहसालार भी तो आखिरकार वही हैं, जो पूर्व में पाकिस्तान के शासक रहे जनरल मुशर्रफ के सहयोगी थे। 2018 में जब इमरान खान की सरकार बनी थी तभी ये कहा गया था कि भले ही मुशर्रफ पाकिस्तान में नहीं हैं, लेकिन, पाकिस्तान में आखिरकार मुशर्रफ राज ही वापस आया है, क्योंकि इमरान के लगभग सभी मंत्री मुशर्रफ राज के ही हैं, और उन्हीं सिपहसालारों की मदद से इमरान बनाना चाहते हैं नया पाकिस्तान। लेकिन, हकीकत यही है कि नया पाकिस्तान बनाने चले इमरान को सियासत की पिच पर मुंह की खानी पड़ रही है और सेना उन पर भारी पड़ रही है। #

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