अंतर्राष्ट्रीय जगत : पश्चिमी एशिया पर मंडराते संकट के बादल

 


कासिम सुलेमानी की हत्या का उद्देश्य ईरान मे राजशाही की पुनः स्थापना करना है, क्योकि अफगानिस्तान और इराक जैसे मुस्लिम देशो मे लोकतंत्र की स्थापना का प्रयास असफल रहा है। दूसरे ईरान की जनता धर्मान्ध है और वहां उदारवादी पश्चिमी समर्थक राजनीतिज्ञो के लिए कोई स्थान नही है। ईरान के शाह सबसे उदारवादी मुसलमान शासक थे और उनके शासनकाल मे ईरान सफलता के नये मापदंड बना रहा था, फिर भी उनका तख्ता पलट दिया गया था। सामान्यत: अमेरिका और ईरान के बीच मे जंगी तनाव का कारण अमेरिका की क्षेत्र मे उपस्थिति और गुंडागर्दी है, सामान्य अध्ययन से पता चलता है, कि अमेरिका खाड़ी के मुस्लिम देशो की तेल की अक़ूत संपत्ति पर अपना कब्जा बनाए रखने, उन्हे डॉलर मे व्यापार करने, आमदनी का एक बड़ा हिस्सा अमरीका मे निवेश करने और पश्चिमी देशो के हथियार खरीदने के लिये खाड़ी के मुस्लिम देशो को मजबूर करता रहा है। किंतु वास्तव मे समस्या धर्मान्धता अर्थात सभ्यताओ की लड़ाई (Clash of Civilization) है, जिसके बारे मे मीडिया चर्चा नही करती है।

बुश परिवार के व्हाइट हाउस मे आने के बाद अमरीकी नीतियो पर ईसाइयत का गहरा प्रभाव पड़ने लगा था, क्योकि जॉर्ज बुश जूनियर चरित्रहीन नौजवान थे, किंतु उनकी पत्नी ने उन्हे नशे और दूसरी बुराइयो से बचाकर सुधार दिया था। इस चरित्र निर्माण मे सबसे महत्वपूर्ण किरदार उनकी पत्नी के ईसाई संप्रदाय यूनाइटेड मेथोडिस्ट चर्च का था, जबकि बुश परिवार का परंपरागत ईसाई संप्रदाय एपिस्कोपल चर्च था, इसलिये बुश ने यूनाइटेड मेथोडिस्ट के कट्टरपंथी विचारो (Evangelist) को अपना लिया। भारत के स्वयंभू आध्यात्मिक गुरूओ (साधू) की तरह बुश की बयानबाजी और हरकते देखकर अमरीकी प्रशासन विशेषकर सी.आई.ए. भी सकते मे आ गया था, क्योकि वह स्वयं को भगवान का चुना हुआ व्यक्ति बताने लगा था और कभी-कभी भगवान से उसको आदेश प्राप्त होने की मूर्खतापूर्ण बाते भी करता था। उसकी इन्ही हरकतो की वजह से उसका नाम इलुमिनाती जैसी शैतानी संस्थाओ से भी जोड़ा जाता है, एक बार तो उसने सद्दाम हुसैन से अमेरिकी लड़ाई को क्रूसडर कहकर तहलका मचा दिया था, जिस पर सी.आई.ए. ने बहुत मेहनत से पर्दा डाला था।

फेडरल बैंक से लेकर हवाई जहाज बनाने के कारखानो तक के मालिक यहूदी है, इसलिये अमेरिका की राजनीति पर यहूदियो का बहुत प्रभाव है। यहूदियो का यह विश्वास है, कि तीसरे विश्वयुद्ध के बाद जब 99 प्रतिशत जनसंख्या मर जायेगी, तब उनका मसीहा आयेगा और सारे विश्व मे यहूदियो के शासन के लिये एकमात्र राज्य की स्थापना करेगा। ईसाइयो का विश्वास है, कि यहूदियो का मसीहा एंटी क्राइस्ट होगा, जिस से लड़ने के लिए स्वयं ईसा मसीह (क्राइस्ट) दोबारा विश्व मे आयेगे अर्थात जब तक यहूदियो का मसीहा नही आएगा, तब तक यशु मसीह भी दोबारा नही आयेगे।

ओबामा धर्मान्ध व्यक्ति नही थे, इसलिये नितिनयाहू की बातो का उन पर कोई प्रभाव नही पड़ता था, एक बार नितिनयाहू ने नाराज होकर ओबामा को बाइबल की एक भविष्यवाणी बताई, जिसमे यर्मीयाह (पैगम्बर) कहता है, कि “मेरे पुत्र ईरान का धनुष तोड़ेगे” अर्थात इसरायल ईरान का परमाणु संयंत्र नष्ट कर देगा। ट्रम्प को सत्ता मे बिठाने मे यहूदी लॉबी का बहुत बड़ा योगदान है, ट्रम्प का दमाद कट्टरपंथी अमरीकी यहूदियो का नेता है और जिसके दबाव मे चलते अमरीका ने यरूशलम को इसरायल की राजधानी बना दिया है, ट्रम्प बार-बार युद्ध की धमकिया देता रहता है, क्योकि जब तक विश्व युद्ध नही होगा, तब तक मसीहा नही आयेगा।

युद्ध को भड़काने के लिये ट्रम्प ने ईरान के दूसरे सबसे लोकप्रिय व्यक्ति कासिम सुलेमानी की हत्या का आदेश दिया, किंतु इससे सारे विश्व मे अमेरिका की आलोचना हुई और वह राजनीतिक पटल पर अकेला पड़ गया। तब अपने षड्यंत्र को विफल होते देख इसरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने ईरान को वायु सुरक्षा दे रही रशियन सुरक्षा प्रणाली के तैनात सिक्योरिटी यूनिट 8200 द्वारा उपयोग किये जा रहे कंप्यूटर मे घुसपैठ द्वारा (Software Hacking) अर्थात साइबर हमला करके यूक्रेन के विमान पी.ए. 752 को मार गिराया और इसका इल्जाम ईरान के ऊपर लगा दिया, ताकि पश्चिमी देश ईरान के विरुद्ध हो जाये।

षड्यंत्र का भंडाफोड़ करते हुये मशहूर अमरीकी खोजी पत्रकार जेरेमी रुथ कुशल (Jeremy Rothe-Kushel) ने लिखा, कि शत्रु के हवाई जहाज और मिसाइल को मार गिराने वाले एंटी मिसाइल सिस्टम और कुछ मिसाइलो मे “मित्र और शत्रु” (friend and foe) के विमान को पहचानने के लिये एक सॉफ्टवेयर प्रोग्राम या चिप (हार्डवेयर) लगाया जाता है, ताकि मानवीय गलती के कारण कही तैनात सुरक्षा अधिकारी अपने ही देश के विमान को ना मार गिराये। उस समय ईरान की वायु सेना रशिया के बनाये हुये सिक्योरिटी सिस्टम (यूनिट 8200) को उपयोग कर रही थी, जिस के सॉफ्टवेयर प्रोग्राम को नियंत्रित करके ही यह खेल रचा गया।

उन्होने आगे लिखा, पिछले वर्ष ईरान ने रूस के ऊपर आरोप लगाया था, कि उसने ईरान को बेचे गये “एस-300 एंटी मिसाइल सिस्टम” का सिक्योरिटी पासवर्ड इसराइल को दे दिया है, अब इसराइल ने दोबारा इसी पासवर्ड का इस्तेमाल किया है। इसराइल के 20 प्रतिशत यहूदी रशियन मूल के है और इनमे से अधिकतर दोहरी नागरिक्ता वाले रशियन उद्योगपति है, जिनके दबाव मे आकर पुतिन इसराइल से खुली दुश्मनी नही लेना चाहते है, पहले भी रशिया ने सद्दाम हुसैन और कर्नल गद्दाफी को धोखा दिया है। पिछले वर्ष इसराइल का मुखपत्र समझे जाने वाले कुवैत के मशहूर अरबी अखबार अल-जरीदा (Al-Jarida) ने खुलासा किया था, कि अमेरिका के बनाये एस-35 इसराइली विमानो ने ईरानी सीमा मे अतिक्रमण करके जासूसी करी है, इसके बाद ईरान मे खलबली मची और कई सैनिक अधिकारियो को बर्खास्त कर दिया गया था। ईरान रशिया को नाराज नही कर सकता है, क्योकि अमेरिका के विरुद्ध ईरान के पास विकल्प सीमित है, किंतु अब वह बहुत चालाकी से चीन की तरफ झुक रहा है और चीन ईरान मे 400 बिलियन डॉलर निवेश की घोषणा कर चुका है। यूक्रेन के इस विमान से पहले छह दूसरी विदेशी एयरलाइंस गुजरी थी, तब इस विमान को ही क्यो मार गिराया गया? इसके जवाब मे उन्होने लिखा इसमे छह ईरानी मूल के कैनेडियन परमाणु वैज्ञानिक मौजूद थे, जिनकी हत्या करना मोसाद का मुख्य उद्देश्य था।

मशहूर सी.आई.ए. एजेंट और गुप्तचर संस्थाओ के विदेशी मिशन और ऑपरेशन पर किताबे लिखने वाले मशहूर लेखक रॉबर्ट डी. स्टेले (Robert David Steele) ने जेरेमी का समर्थन करते हुये कहा, कि इस यूक्रेनियन एयरलाइंस का मालिक दोहरी नागरिकता रखने वाला एक यहूदी है और जो इस समय इसराइल मे रह रहा है। रॉबर्ट ने कहा कि बोइंग विमान मे ऐसे सॉफ्टवेयर लगाये जाते है, जिनको जी.पी.आर.एस. सिस्टम की सहायता से सक्रिय करके विषम परिस्थितियो मे विमान बनाने वाली कंपनी (बोइंग) द्वारा हवाई जहाज पर नियंत्रण किया जा सके। इसी तकनीक का फायदा उठाते हुये मोसाद ने हवाई जहाज के सिस्टम को आंशिक रूप से बंद (Jammed) करके पायलट को अपंग कर दिया था, फिर दूसरी तरफ एस-300 एंटी मिसाइल सिस्टम मे घुसपैठ (hacking of friend & foe software) करके मिसाइल को जहाज के उपर मार दिया गया। चन्द मिनटो के अंदर यह घटनाक्रम क्यो घटित हुआ अर्थात हवाई जहाज के उड़ते ही क्यो मार दिया गया? इसका कारण उन्होने बताया, कि अगर पायलट सिस्टम फेलियर की रिपोर्ट करता है, तो उसे आदेश दिया जाता है (सिखाया गया है), कि पायलट हवाई जहाज़ को ज़मीन पर उतारने से पहले आसमान मे कुछ चक्कर लगाकर अपने पेट्रोल की टंकी को खाली कर ले, क्योकि टंकी मे अधिक पेट्रोल होने से जोरदार धमाका होने अर्थात बड़ी हानि होने का खतरा होता है। दूसरे थोड़ा सा ज्यादा समय मिलने के बाद ईरान की सुरक्षा एजेंसियां विशेषकर हवाई सेना सतर्क हो जाती और षड्यंत्र का भांडा फूट जाता, इसलिए पहले हवाई जहाज का पूरा कम्यूनिकेशन सिस्टम स्विच ऑफ कर दिया गया, ताकि वह रडार की डयूटी पर तैनात ईरानी वायु सैनिको से संवाद ना कर सके और ईरान के सुरक्षा अधिकारियो को ऐसा लगे (भ्रम), कि रडार पर दिखाई देने वाला जहाज (un identify object) शायद अमेरिका का स्टील्थ (रडार पर ना दिखाई देने वाला) एस-35 हवाई जहाज है।

इस सारे विवाद की शुरुआत उस मोबाइल वीडियो से हुई थी, जिसमे विमान के पीछे दो आग के गोले को आते और फिर विमान से टकराते देखा गया था। मध्य रात्रि को आसमान की तरफ मुंह करके कौन शूटिंग करेगा? इतना सक्रिय और सतर्क व्यक्ति कौन था जिसको यह पता था, कि मध्य रात्रि को हवाई जहाज गिराया जाने वाला है? 10 सेकेंड से भी कम समय मे घटित घटना का इतना सफाई से कैसे वीडियो बना लिया गया? चंद घंटो मे ही बिना किसी जांच और राजनैतिक बयान के न्यूयॉर्क टाइम्स को कैसे पता चला कि वीडियो मे दिखाई देने वाले दो आग के गोले वास्तव मे ईरानी मिसाइले है? कैनेडा ने पहले 63 नागरिको की सूची जारी करी थी, जो बाद मे घटकर 57 रह गई थी, तहक़ीकात से पता चला कि छह हटाए गये नाम परमाणु वैज्ञानिको के है।

इन संदेहास्पद घटनाओ से षडयंत्र का अंदाजा लगाया जा सकता है, कि पश्चिमी देश शिया-सुन्नी के बीच मे जंग कराकर मुस्लिम देशो के सैनिक ढांचे को तबाह कर देना चाहते है, ताकि हैकल सुलेमानी मंदिर और ग्रेटर इसराइल के निर्माण के रास्ते मे आने वाली रुकावट को दूर किया जा सके। युद्ध टालने के लिए ईरान ने सहनशीलता का परिचय दिया, तो अमेरिका ने यमन मे ईरान के वरिष्ठ सैनिक अधिकारी अब्दुल रज़ा शैलाई के ऊपर हमला कर दिया, क्योकि अमेरिका जानता है, कि ईरान अमरीका की भूमी पर पहुंचकर हमला नही कर सकता है, किन्तु वह बदला लेने के लिये खाड़ी के सुन्नी अरब देशो मे मौजूद अमरीकी अड्डो पर हमला करेगा, जिससे सुन्नी-अरब और शिया-ईरान और उसके समर्थको के बीच मे युद्ध शुरू हो जायेगा। जॉर्डन की दाए बाजू की राजनैतिक पार्टी हिज्ब-उत-तहरीर (Hizb ut-Tahrir) के नेता और मशहूर दार्शनिक मुस्लिम तकी नभानी (Taqi al-Din al-Nabhani) ने कहा था, कि ईरानी क्रांति पश्चिमी देशो का एक षड्यंत्र है, जिसको वह अफगानिस्तान और इराक मे इस्तेमाल करेगे अर्थात शिया और सुन्नी जंग की शुरुआत होगी।

ईरान के नेता महान मुस्लिम धर्मगुरु अयातुल्लाह खुमेनी बहुत ही समझदार व्यक्ति और दार्शनिक थे, उन्होने जीवन भर शिया-सुन्नी एकता के लिए कार्य किया, उन्होने ईरान-इराक युद्ध को धर्म युद्ध कहने से इनकार करके और इसे अरब-अजम अर्थात नस्ली लड़ाई बताकर शिया-सुन्नी एकता को बनाये रखा। अयातुल्लाह खुमेनी की मृत्यु के बाद अमेरिका ने सद्दाम हुसैन का तख्ता पलटकर ईराक मे एक शिया सरकार की स्थापना करी, पहले ईरानी सरकार के ईराक मे हस्तक्षेप को जानबूझकर नजरअंदाज किया, फिर अलकायदा और दाइश (ISIL) जैसे वहाबी आतंकवादी संगठनो से लड़ने के लिये ईरान से सहयोग लिया। मशहूर पाकिस्तान बुद्धिजीवी और राजनैतिक विश्लेषक ओरिया मकबूल जान का मत है, कि अमेरिका चाहता है कि ईरान से लेकर लबनान तक एक शिया राष्ट्र बने, जिसकी सीमाये इसराइल तक आ जाएं, ताकि वह सीधे इसराइली सरहद से शिया आतंकवादियो को मदद दे सके।

दाइश जैसे वहाबी आतंकवादी संगठनो को सी.आई.ए. और मोसाद पहले से ही मदद कर रही है, फिर जब शिया आतंकवादी संगठनो को इस्राइली मदद मिलेगी, तो क्षेत्र मे ऐसी आग लगेगी जिससे नाइजीरिया से लेकर पाकिस्तान तक के सारे इस्लामिक देश उस आग मे जलकर राख़ हो जायेगे। ईरान के धर्मगुरु अयातुल्लाह खुमेनी की मृत्यु के बाद अमरीकी षड्यंत्र को कामयाब बनाने मे जनरल कासिम सुलेमानी का किरदार सबसे महत्वपूर्ण रहा है, वह शिया आतंकवाद के जनक थे। उन्होने दो दर्जन से ज्यादा शिया आतंकवादी संगठनो को पैदा किया, जो अफ्रिका के नाइजीरिया (Islamic movement of Nigeria) से लेकर लैटिन अमेरिका के ट्रीनाड (Jamaat al Muslimeen of Trinidad) तक फैले हुये है, 17 मार्च 1992 को अर्जेन्टीना के शहर ब्यूनस आयर्स (Buenos Aires) मे इसराइली दूतावास पर हुये हमले को कासिम सुलेमानी के लड़ाको ने बड़ी कुशलता से अंजाम दिया था।

कासिम सुलेमानी की सैनिक संस्था “सिपाह पासदाराने इंकलाब इस्लामी” (Islamic Revolutionary Guard Corps) की जब कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस होती है, तो फिर प्रवक्ता के पीछे दर्जनो आतंकवादी संगठनो के झंडे देखे जा सकते है, जिनमे लबनान से हिज्बुल्लाह, यमन से अंसारुल्लाह, ईराक से हशदु शेबी, अफगानिस्तान से लेवाये फातीम्यून, पाकिस्तान से लेवाये जैनब्यून, फिलिस्तीन से हमास की कासिम ब्रिगेड, ईरान से पासदाराने इंकलाब और बासेज जैसे आठ संगठनो के झंडे हमेशा देखे जा सकते है। अगर हरकतुल नजाबा, लेवाये अबु-फज़ल अल-अब्बास और असाब अहले हक जैसे सर्वाधिक संगठन ईराक से आते है, तो हिज्बुल्लाह लबनान के साथ-साथ सीरिया और दूसरे देशो मे भी मौजूद अंतराष्ट्रीय आतंकवादी संगठन है, अगर अफगानिस्तान से लेवाये फातीम्यून छापामार युद्ध मे सर्वाधिक पारंगत और खूंखार संगठन है, तो पाकिस्तान से लेवाये जैनब्यून के पास सबसे ज्यादा छापामार (Manpower) है। पाकिस्तान का लेवाये जैनब्यून 2015 से पहले अफगानिस्तान के लेवाये फातीम्यून का अंग था, अधिकारिक तौर पर इसके पास लगभग तीस हजार लड़ाके है, जबकि निजी सूत्रो के अनुसार इनकी संख्या तीन लाख से साढ़े तीन लाख के बीच है, इसमे भारतीय शिया मुसलमानो के शामिल होने का भी अंदेशा है (विशेषकर कारगिल के कश्मीरी शिया)।

लेवाये जैनब्यून (Liwa Zainebiyoun) मे लड़ाको की भर्ती बकायदा विज्ञापन देकर होती है, जिसमे बारह सौ अमेरिकी डॉलर प्रति माह का वेतन और बीस हजार अमेरिकी डॉलर की मृत्यु राशि मिलती है, लड़ाको की पहले 45 दिन की ट्रेनिंग ईरान मे होती है, फिर 6 महीने की ट्रेनिंग सीरिया मे दी जाती है, उसके बाद युद्ध ग्रस्त क्षेत्रो मे तैनात कर दिया जाता है, मरने के बाद सम्मान स्वरूप ईरान-ईराक के पवित्र धार्मिक शहरो मे दफनाना जाता है। लेवाये जैनब्यून की वजह से पाकिस्तान मे संप्रदायिक तनाव बढ़ रहा था, तब इमरान खान ने ईरान का दौरा करके शिया धर्मगुरु अयातुल्लाह खमनई से सारी समस्या पर चर्चा करते हुये अमरीकी और इसराइली षड्यंत्र का पर्दाफाश किया, इमरान के साथ गये सेना अध्यक्ष बाजवा और आई.एस.आई. अध्यक्ष फ़ैज़ अहमद ने सबूत पेश किये। धर्मगुरु अयातुल्लाह खमनई ने ईरान के सैनिक अधिकारियो को डांट लगाई और एक अधिकारी को बर्खास्त करके आदेश दिया, कि ईरान सरकार शिया-सुन्नी झगड़े को तुरंत खत्म करे, इसके लिये उन्होने पाकिस्तान और ईराक से ईरान और खाड़ी के अरब देशो के बीच मध्यस्थता का आग्रह किया।

सी.आई.ए. के सहयोगी रहे जनरल कासिम सुलेमानी ने अपने धर्मगुरु के आदेश का तुरंत पालन करना शुरू कर दिया, इसी प्रक्रिया मे वह ईराक जा रहे थे, ताकि ईराक की मार्फत सऊदी अरब और ईरान के बीच मे शीघ्र होने वाली गुप्तवार्ता की कार्यसूची (एजेंडा) को अंतिम रूप दिया जा सके। मोसाद की मार्फत जब यह सूचना अमेरिका को मिली तो ट्रम्प ने कासिम सुलेमानी की हत्या का आदेश दे दिया, फिर ईरान के भूतपूर्व राज परिवार के सदस्यो से संपर्क करना शुरू कर दिया, यद्यपि अभी तक उसे कोई कामयाबी नही मिली है, लेकिन अमेरिका आसानी से चुप बैठने वाला नही है। ऊंट किस करवट बैठेगा? यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन मानवता अपने सबसे बड़े संकट के दौर मे पहुंच गई है, जहां तक एक तरफ जलवायु परिवर्तन मानव जाति के लिये खतरा बना हुआ है, तो दूसरी तरफ परमाणु युद्ध पृथ्वी का विनाश कर सकता है। #

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