सत्ता के गलियारों से : दिल्ली के चुनाव परिणाम क्या इंगित करेंगे?

 


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भाजपा दिल्ली में विधानसभा चुनाव जीतने के लिए जिस तरह एड़ी चोटी का जोर लगा रही है उससे तो ऐसा ही लगता है कि संसाधन और जनशक्ति भाजपा के लिए कोई समस्या नहीं है और दिल्ली के सभी सात लोकसभा पर कुछ महीने पहले ही जीत हासिल करने वाली भाजपा बड़े जोर से ताल ठोक रही है। फिर भी पार्टी को पता है कि आम आदमी पार्टी के अरविन्द केजरीवाल में उसका एक मजबूत प्रतिद्वंदी है और उसे कम आंकलन करने की कोशिशे अब तक सफल नहीं हुई है। इसलिए दिल्ली में चुनावी लड़ाई कठिन है। 

पर प्रश्न यह है की केंद्र में जमी भाजपा दिल्ली को लेकर इतनी परेशान क्यों है। शायद इसका कारण ढूढना मुश्किल नहीं है पिछले लगभग 21 वर्षो से जब से भाजपा एक राष्ट्रीय स्तर की बड़ी राजैनतिक शक्ति बन गयी है और केंद्र में सत्ता प्राप्त करने में भी कई बार सफल हुई है। वह कभी भी दिल्ली विधान सभा का चुनाव जीतने और राष्ट्रीय राजधानी पर राज करने का अपना सपना पूरा नहीं कर पायी है। ऐसी पार्टी जिसने सुदूर असम और त्रिपुरा में भी चुनाव जीता है वह अगर दिल्ली का चुनाव जीतने में असफल रहे तो यह वास्तव में उसके लिए एक दुखदायी बात है। यह दुख और भी अधिक लगता है क्योंकि अरविन्द केजरीवाल ने डॉ मनमोहन सिंह की कांग्रेस सरकार के खिलाफ भाजपा के भ्रष्टाचार के मुख्य अभियान को चुरा लिया और खुद सत्ता में आ गए। यही नहीं केजरीवाल दिल्ली के मतदाताओं को यह समझाने में भी सफल रहे है कि वह और उनकी आम आदमी पार्टी नरेंद्र मोदी की भाजपा की तुलना में भ्रष्टाचार से लड़ने में अधिक गंभीर और प्रतिबद्ध है। 

फिर वर्ष 2014 में लोकसभा चुनाव में अपनी शानदार जीत के बाद भाजपा को 2015 में दिल्ली विधानसभा चुनाव में जो अपमानजनक पराजय मिली वह उसके सत्ता के नशे में चूर नेताओं के लिए ऐसा झटका था जिसे वह अभी तक नहीं भूल पाए हैं। एक बात यह भी है कि पिछले दिनों महाराष्ट्र और झारखण्ड में सत्ता गवाने के बाद और हरियाणा में अपने खऱाब प्रदर्शन के कारण आज भाजपा की यह मज़बूरी है कि वह दिल्ली का चुनाव जीत कर यह साबित करे कि वह अभी भी अजेय हैं और मोदी का जादू बरकऱार है।

जनमत सर्वेक्षण और आम धारणा की बात करें तो वह केजरीवाल की आम आदमी पार्टी की आसान जीत की ओर इशारा करते नजर आते हैं। पर इस चुनाव में भाजपा की पुरजोर कोशिश के कारण केजरीवाल की राह पिछली बार की तरह आसान नहीं दिखती है। यदि आम आदमी पार्टी को 2015 के चुनाव में 70 में 67 सीटों पर सफलता मिली तो 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा 65 विधानसभा क्षेत्रों में आगे थी। फिर आम आदमी पार्टी को कांग्रेस के स्तर में सुधार से भी घाटा हो सकता है क्योंकि अगर कांग्रेस पिछली बार के मुकाबले अच्छी स्थिति में होती है तो इसका लाभ भाजपा को मिलेगा। इस बात के जोरदार संकेत है कि मुसलमान मतदाता कांग्रेस की ओर लौट रहे है और शायद दलित मतदाता भी उनके पीछे पीछे कांग्रेस में आएंगे। यह दो बड़े समुदाय कांग्रेस के पारम्परिक वोट बैंक रहे है और उनकी वापसी से भारत की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी की किस्मत बदल सकती है पर जहा तक दिल्ली विधानसभा के चुनाव का प्रश्न है लगता है कांग्रेस की स्थिति में सुधार से दिल्ली में जो त्रिकोणीय संघर्ष होगा उसमे फायदा भाजपा को ही मिलेगा।

ऐसी भी खबरें आ रही हैं कि भाजपा की चुनावी रणनीति दलित मतदाताओं को कांग्रेस में जाने के लिए प्रोत्साहित करना है। वर्तमान में दिल्ली की अनाधिकृत और निम्न मध्यम वर्गीय कॉलोनियों में रहने वाले मतदाता केजरीवाल की आम आदमी पार्टी का वोट बैंक हैं। यदि वह कांग्रेस में चले जाते है तो भाजपा पंजाबी, जाट और बिहारी मतदाताओं के समर्थन से दिल्ली विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी बन सकती है। पर भाजपा के रास्ते में दो अड़चने है। भाजपा से विमुख मुस्लिम मतदाता ऐसा कुछ भी नहीं करेंगे जो भाजपा विरोधी वोटो को विभाजित करे। दूसरी बात यह है कि जमीनी स्तर पर काम करने से केजरीवाल सरकार दिल्ली के गरीब नागरिको के जीवन को बेहतर करने में सफल हुई है और शायद मतदाता जाति-धर्म की बातो से उपर उठकर केजरीवाल सरकार को पांच साल और काम करने का मौका दे सकते हैं। मतदाता कैसे अपना मन बनाते हैं और अंत में किसको अपना वोट देते हैं यह कह पाना हमेशा से मुश्किल रहा है। लेकिन एक बात तो निश्चित है कि आज के दिन दिल्ली या कहीं और मोदी की भाजपा को केवल तभी हराया जा सकता है जब विपक्ष एकजुट होकर चुनाव लड़े। एक बिखरा पड़ा विपक्ष भाजपा की चुनावी सफलता की गारंटी है।

चाहे कुछ भी हो दिल्ली के चुनाव नतीजे भारतीय मतदाता की रुझान की ओर इशारा करते हैं। दिल्ली उपराज्य होते हुए भी लगभग दो करोड़ लोगों की आबादी का घर है और यहाँ बड़े पैमाने पर देश के तमाम विभिन्न समाज, भाषा, धर्म और संस्कृति के लोगों का समागम स्थल है। किसी भी अन्य राज्य के चुनाव की तुलना में दिल्ली के चुनाव परिणाम यह ज्यादा अच्छी तरह इंगित करेंगे कि भाजपा की जमीनी पकड़ अभी मजबूत है या फिर कमजोर हो रही है और 1या मतदाताओं के ऊपर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जादू चल रहा है या नहीं। #

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